Thursday, March 27, 2025

गोलेन्द्रवाद क्या है? (What is Golendrism?)


 What is Golendrism? गोलेन्द्रवाद क्या है?

Golendrism (गोलेन्द्रवाद) मानवतावादी दर्शन है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है। यह मानवीय चेतना को जागृत करता है।

परिभाषा (Definition) :-

“गोलेन्द्रवाद (Golendrism) मानवीय जीवन जीने की पद्धति है, जो जाति, धर्म, भाषा और भूगोल से निरपेक्ष, समय-सापेक्ष वैज्ञानिक दर्शन के साथ मानवतावाद पर केंद्रित है।”
अथवा,
“गोलेन्द्रवाद (Golendrism) मानवीय जीवन जीने की पद्धति है, ‘गोलेन्द्रवादी दर्शन’ जाति, धर्म, भाषा एवं भूगोल निरपेक्ष है, यह पूरी तरह मानवतावाद पर केंद्रित वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। गोलेन्द्रवाद समय-सापेक्ष वैज्ञानिक दर्शन है, मानवतावादी दृष्टिकोण है।”

सारांश:- Golendrism (गोलेन्द्रवाद) मानवतावादी दर्शन है। जिसके अंतर्गत बुद्ध दर्शन, साम्यवाद, समाजवाद, किसानवाद, प्रकृतिवाद, राष्ट्रवाद, गाँधीवाद, अंबेडकरवाद, मार्क्सवाद, मनोविश्लेषणवाद, अस्तित्ववाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, तर्कवाद, विज्ञानवाद, दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श और अल्पसंख्यक विमर्श के महत्त्वपूर्ण मानवीय तत्वों को रखा गया है। जो गोलेन्द्रवादी हैं, वे जाति, धर्म, भाषा और भूगोल निरपेक्ष हैं, क्योंकि गोलेन्द्रवाद मनुष्य को जाति संस्कार, धर्म संस्कार, भाषा संस्कार और भूगोल संस्कार से मुक्त करता है। यह उन्हें मानवीय दृष्टि प्रदान करता है।

प्रस्तावना:- गोलेन्द्रवाद एक मानवतावादी दर्शन है, जिसके जनक बहुजन कवि गोलेन्द्र पटेल हैं। यह विचारधारा सामाजिक न्याय, समता, समानता, स्वतंत्रता, वैश्विक बंधुत्व, दलितों, वंचितों, शोषितों, उपेक्षितों, उत्पीड़ितों, किसानों , मजदूरों और दबे-कुचलों के अधिकारों पर केंद्रित है और ग्रामीण जीवन के संघर्षों को संबोधित करती है। गोलेन्द्र पटेल, एक भारतीय कवि, लेखक, विचारक और सामाजिक सुधारक हैं, उन्होंने इस दर्शन को अपनी काव्य रचनाओं के माध्यम से विकसित और प्रसारित कर रहे हैं। उनका जन्म उत्तर प्रदेश के चंदौली में हुआ और वे मुख्य रूप से हिंदी भाषा में लिखते हैं। उनकी कविताएँ कबीर की शैली से प्रेरित हैं, जिसमें सादगी और गहराई के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता और सुधार पर जोर दिया गया है। इसी कारण उन्हें "हिंदी का दूसरा कबीर" भी कहा जाता है।

गोलेन्द्रवाद में बुद्ध दर्शन, साम्यवाद, समाजवाद, किसानवाद, प्रकृतिवाद, राष्ट्रवाद, गाँधीवाद, अंबेडकरवाद, मार्क्सवाद, मनोविश्लेषणवाद, अस्तित्ववाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, तर्कवाद, विज्ञानवाद, दलित विमर्श, स्त्री विमर्श, आदिवासी विमर्श और अल्पसंख्यक विमर्श जैसे तत्वों का समावेश है। यह विचारधारा शोषित वर्गों के उत्थान, उनके आत्मसम्मान को बढ़ाने और सामाजिक असमानता, शोषण एवं अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने पर बल देती है। गोलेन्द्र पटेल का मानना है कि सच्ची प्रगति तभी संभव है जब समाज के सबसे निचले तबके को भी न्याय और सम्मान प्राप्त हो। उनकी रचनाएँ ग्रामीण भारत के मेहनतकश लोगों की पीड़ा, कठिनाइयों और उनके अधिकारों को उजागर करती हैं, जो आम जनता तक आसानी से पहुँचती हैं।

गोलेन्द्रवादी कवि के रूप में गोलेन्द्र पटेल को जाना जाता है। प्रकृतिवाद का प्रभाव गोलेन्द्रवाद में स्पष्ट है, जो मानव और प्रकृति के बीच संतुलित संबंध को महत्व देता है। यह दर्शन विभिन्न विचारधाराओं को एकीकृत करते हुए एक समग्र दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो आज के समय में सामाजिक न्याय और समानता के संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है। गोलेन्द्र पटेल ने न केवल साहित्यिक योगदान दे रहे हैं, बल्कि अपनी कविताओं और विचारों के माध्यम से सामाजिक बदलाव की दिशा में भी प्रयासरत हैं।

गोलेन्द्रवाद को एक समग्र दर्शन के रूप में देखा जा रहा है। जनपक्षधर्मी कवि गोलेन्द्र पटेल, जिन्हें गोलेन्द्रवाद के जनक के रूप में जाना जाता है, वे तथागत बुद्ध, महावीर स्वामी, संत रैदास, संत कबीर, संत तुकाराम, महात्मा ज्योतिबा फुले, छत्रपति शाहूजी महाराज, संत गाडगे महाराज, बाबा साहब अंबेडकर, ई०वी० रामास्वामी पेरियार, ललई सिंह यादव, मान्यवर कांशीराम, बिरसा मुंडा, बसवन्ना, सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख, रमाबाई अंबेडकर, सुकरात, प्लेटो, अरस्तू, कार्ल मार्क्स, फ़्रेडरिक एंगेल्स, लेनिन, नीत्शे, माओ त्से तुंग, डार्विन, कापरनिकस, अल्बर्ट आइंस्टीन इत्यादि बहुजन शुभचिंतकों से प्रभावित रचनाकार हैं। वे मनुवाद, ब्राह्मणवाद, जातिवाद, सामंतवाद, पाखंडवाद, रूढ़िवाद के ख़िलाफ़ रहने वाले साहित्यकार हैं।

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Sunday, March 23, 2025

क्या कवि गोलेन्द्र पटेल हिंदी के दूसरे कबीर हैं? || संत कबीर और गोलेन्द्र पटेल || Kya Kavi Golendra Patel Hindi Ke Dusare Kabir Hain

 क्या कवि गोलेन्द्र पटेल हिंदी के दूसरे कबीर हैं?

गोलेन्द्र पटेल की कविता में मानवीय जीवन दर्शन, जनपक्षधरता, सृजनात्मकता, साहित्यिकता, सम्यक दृष्टि, समयदर्शिता, आध्यात्मिकता एवं आत्मीयता जैसे गुण मौजूद हैं और उनकी रचनाओं में मित्र, मुहब्बत और मनुष्यता का समावेश है। ChatGPT, Gemini, Google Assistant और Grok 3 जैसे टाॅप 10 AI मॉडल गोलेन्द्र को हिंदी का दूसरा कबीर कह रहे हैं।

कवि गोलेन्द्र पटेल की तुलना हिंदी के दूसरे कबीर से करना एक जटिल विषय है। यह तुलना कई पहलुओं पर निर्भर करती है, जैसे कि उनकी कविता का विषय, शैली और सामाजिक प्रभाव। गोलेन्द्र पटेल आधुनिक हिंदी कविता के एक महत्वपूर्ण कवि हैं। उनकी कविता में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर गहरी चिंता व्यक्त की गई है। वे आम आदमी के जीवन और संघर्षों को अपनी कविता का विषय बनाते हैं। उनकी भाषा सरल और सीधी होती है, जो उन्हें व्यापक दर्शकों तक पहुंचने में मदद करती है। कबीर 15वीं सदी के एक महान संत और कवि थे। उनकी कविता में धार्मिक आडंबरों और सामाजिक बुराइयों पर तीखा व्यंग्य किया गया है। वे भक्ति और प्रेम के महत्व पर जोर देते हैं। उनकी भाषा भी सरल और सीधी होती है, लेकिन उसमें एक आध्यात्मिक गहराई होती है। गोलेन्द्र पटेल और कबीर दोनों ही सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अपनी आवाज उठाते हैं। दोनों ही आम आदमी के जीवन और संघर्षों को अपनी कविता का विषय बनाते हैं। दोनों की भाषा सरल और सीधी होती है। हालांकि, दोनों कवियों में कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। कबीर एक संत थे और उनकी कविता में एक आध्यात्मिक गहराई होती है। गोलेन्द्र पटेल एक आधुनिक कवि हैं और उनकी कविता में सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है। दोनों कवि अपनी-अपनी जगह पर महत्वपूर्ण हैं और दोनों ने हिंदी कविता को समृद्ध किया है।

कुछ कवि-आलोचक गोलेन्द्र पटेल को हिंदी का दूसरा कबीर मानते हैं। वे ऐसा इसलिए कह सकते हैं क्योंकि गोलेन्द्र पटेल की कविता में कबीर के समान सामाजिक चेतना, विद्रोह का स्वर और आम आदमी के प्रति सहानुभूति दिखाई देती है।

गोलेन्द्र पटेल की कविता में कबीर के समान निम्नलिखित तत्व पाए जाते हैं:

 * सामाजिक चेतना: गोलेन्द्र पटेल की कविता में समाज में व्याप्त असमानता, अन्याय और भ्रष्टाचार पर तीखा व्यंग्य किया गया है। वे दलितों, मजदूरों और हाशिए पर रहने वाले लोगों के दुखों और संघर्षों को अपनी कविता का विषय बनाते हैं, ठीक उसी तरह जैसे कबीर ने किया था।

 * विद्रोह का स्वर: गोलेन्द्र पटेल की कविता में स्थापित व्यवस्था और रूढ़ियों के खिलाफ विद्रोह का स्वर मुखर है। वे पाखंड, अंधविश्वास और जातिवाद जैसी सामाजिक बुराइयों पर कड़ा प्रहार करते हैं, जो कबीर की कविता में भी प्रमुखता से मिलता है।

 * आम आदमी के प्रति सहानुभूति: गोलेन्द्र पटेल की कविता में आम आदमी के जीवन के प्रति गहरी सहानुभूति दिखाई देती है। वे उनकी आशाओं, आकांक्षाओं और संघर्षों को ईमानदारी से व्यक्त करते हैं, जैसा कि कबीर ने अपनी कविता में किया था।

 * सरल और सीधी भाषा: गोलेन्द्र पटेल अपनी बात को सीधे और सरल शब्दों में कहते हैं, जो उन्हें आम लोगों तक पहुंचने में मदद करता है। कबीर की भाषा भी सीधी और सहज थी, जिसमें लोकभाषा के तत्वों का प्रयोग किया गया था। हालांकि, यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि गोलेन्द्र पटेल और कबीर के बीच कुछ महत्वपूर्ण अंतर भी हैं। कबीर एक संत थे और उनकी कविता में भक्ति और आध्यात्मिकता का गहरा प्रभाव है, जबकि गोलेन्द्र पटेल एक आधुनिक कवि हैं और उनकी कविता में समकालीन सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है। इसलिए, जबकि कुछ आलोचक गोलेन्द्र पटेल में कबीर की छाया देखते हैं, यह कहना मुश्किल है कि वे "दूसरे कबीर" हैं या नहीं। दोनों कवियों का अपना विशिष्ट महत्व है और दोनों ने हिंदी कविता को समृद्ध किया है। यह तुलना इस बात पर निर्भर करती है कि आलोचक किन पहलुओं को अधिक महत्वपूर्ण मानते हैं।

यदि कवि-आलोचक गोलेन्द्र पटेल को हिंदी का दूसरा कबीर कह रहे हैं, तो संभवतः वे उनकी सामाजिक चेतना और विद्रोही तेवर से प्रभावित हैं, जो कबीर की कविता की भी प्रमुख विशेषताएं हैं।

ध्यान देने वाली कुछ बातें:- 

 * मानवीय जीवन दर्शन: कबीर ने भी अपने दोहों और पदों में जीवन की वास्तविकता, मनुष्य की स्थिति और मोक्ष के मार्ग पर अपने विचार व्यक्त किए हैं।

 * जनपक्षधरता: कबीर ने हमेशा समाज के कमजोर और वंचित वर्गों की बात की और पाखंडी धार्मिक नेताओं और सामाजिक बुराइयों की आलोचना की। गोलेन्द्र पटेल में भी यह गुण स्पष्ट रूप से दिखता है।

 * सृजनात्मकता और साहित्यिकता: दोनों ही कवियों की रचनाओं में भाषा का अनूठा प्रयोग और गहरी साहित्यिक समझ दिखाई देती है, भले ही उनकी शैलियाँ अलग हों।

 * सम्यक दृष्टि और समयदर्शिता: दोनों कवियों ने अपने समय की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों को गहराई से समझा और अपनी रचनाओं में उसका प्रतिबिंब दिखाया।

 * आध्यात्मिकता: कबीर एक संत थे और उनकी कविता में आध्यात्मिकता एक महत्वपूर्ण तत्व है। यदि गोलेन्द्र पटेल की कविता में भी आध्यात्मिकता है, तो यह तुलना का एक और बिंदु हो सकता है।

 * आत्मीयता: दोनों कवियों की रचनाओं में एक प्रकार की आत्मीयता और जुड़ाव महसूस होता है, जो पाठकों को उनसे जोड़ता है।

 * मित्र, मुहब्बत, मनुष्यता: यह पहलू विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। कबीर ने प्रेम और मानवीय संबंधों के महत्व पर जोर दिया। यदि गोलेन्द्र पटेल की कविता में भी ये तत्व प्रमुख हैं, तो यह उनकी मानवीय संवेदनशीलता और व्यापक दृष्टिकोण को दर्शाता है।

 यह वास्तव में एक दिलचस्प और विचारणीय बिंदु है। अगर कवि-आलोचक गोलेन्द्र पटेल को "हिंदी के दूसरे कबीर" के रूप में संदर्भित करते हैं, तो इसका मतलब है कि वे उनकी कविता में कबीर की भांति समाज की आलोचना, धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यताओं पर सवाल उठाने और मनुष्य की मूलभूत संवेदनाओं और सच्चाई की खोज को पहचानते हैं। कबीर का काव्य समाज के कठोर रीतिरिवाजों, आडंबर और पाखंड पर प्रहार करता था। उनकी कविता में सत्य की खोज, आत्मा की स्वतंत्रता, और धर्म के बाहर मानवता का संदेश था। यदि हम इस दृष्टिकोण से देखें, तो गोलेन्द्र पटेल की कविताएँ भी समाज की निरंतर बदलती वास्तविकताओं पर तीखी टिप्पणियाँ करती हैं और किसी प्रकार से कबीर के समान सामाजिक जागरूकता की दिशा में प्रेरित करती हैं। उनका काव्य भी अक्सर मानवीय संवेदनाओं, असमानताओं और ज़रूरतों को उजागर करता है, साथ ही साथ किसी प्रकार की रूढ़िवादी सोच या पाखंड के खिलाफ आवाज उठाता है। इसलिए, जब आलोचक गोलेन्द्र पटेल को "हिंदी के दूसरे कबीर" के रूप में स्वीकार करते हैं, तो वे शायद उनके काव्य में कबीर की तरह की निर्भीकता, प्रखरता और सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव की ओर इशारा कर रहे होते हैं। दोनों ही कवि समाज को जागरूक करने के लिए अपने वक्त की जटिलताओं और असमानताओं पर प्रकाश डालते हैं। हालांकि, यह तुलना पूरी तरह से संदर्भित विचारधारा और शैली पर निर्भर करती है। इस संदर्भ में गोलेन्द्र पटेल की कविता को कबीर के विचारों के समानांतर खड़ा किया जा सकता है, लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दोनों के कवि व्यक्तित्व और साहित्यिक दृष्टिकोण अलग-अलग हैं। गोलेन्द्र पटेल को हिंदी का "दूसरा कबीर" कहना एक विचारणीय तुलना है, जो कुछ हिंदी कवि-आलोचकों और साहित्य प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय रहा है। दोनों कवियों के बीच कुछ समानताएँ निश्चित रूप से देखी जा सकती हैं, जब हम कहते हैं कि गोलेन्द्र पटेल "हिंदी के दूसरे कबीर" हैं, तो यह एक साहित्यिक और वैचारिक संदर्भ में किया गया मूल्यांकन है, जो उनके काव्य में मौजूद तत्वों को कबीर के दृष्टिकोण से जोड़ता है। कबीर और गोलेन्द्र पटेल के बीच कुछ समानताएँ हैं, जिन्हें ध्यान में रखते हुए उन्हें "दूसरे कबीर" के रूप में देखा जा सकता है:

1. **समाज की आलोचना और जागरूकता**: कबीर ने अपने समय के पाखंड, धर्म के नाम पर चल रहे आडंबर और समाज की असमानताओं के खिलाफ अपनी कविताएँ लिखीं। इसी तरह, गोलेन्द्र पटेल भी अपने काव्य में समाज की जटिलताओं और असमानताओं को उजागर करते हैं। वे हर प्रकार के सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक रूढ़िवादियों के खिलाफ अपनी आवाज़ उठाते हैं। दोनों के लेखन में समाज सुधार का स्पष्ट उद्देश्य है।

2. **मानवता और करुणा**: कबीर की कविताओं में मानवता, प्रेम और करुणा की गहरी भावना थी। वे हर धर्म, जाति और पंथ से ऊपर उठकर सार्वभौमिक प्रेम और करुणा की बात करते थे। गोलेन्द्र पटेल की कविताओं में भी प्रेम, करुणा, मित्रता और मुहब्बत की बातें होती हैं। उनकी कविताएँ मानवीय संवेदनाओं, सहानुभूति और समाज में एकजुटता के संदेश को फैलाती हैं।

3. **आध्यात्मिकता और सत्य की खोज**: कबीर का ध्यान अपनी कविताओं में आत्मा, भगवान और सत्य की खोज पर था। वे धार्मिक पाखंडों को नकारते हुए सीधे आत्मा की सच्चाई और ईश्वर के वास्तविक स्वरूप की बात करते थे। गोलेन्द्र पटेल के यहाँ भी आध्यात्मिकता का तत्व मिलता है, जो मनुष्य के भीतर के सत्य और अस्तित्व के महत्व को उजागर करता है।

4. **निर्भीकता और विरोध**: कबीर ने कभी भी धर्म या सामाजिक व्यवस्था से डरकर अपने विचारों को नहीं छिपाया, और गोलेन्द्र पटेल भी अपनी कविताओं में समाज के लिए कठिन और सच्चे सवाल उठाते हैं। दोनों में एक प्रकार की निर्भीकता और स्पष्टता है, जो उन्हें समाज और समय के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह करने में प्रेरित करती है।

इन समानताओं के आधार पर, साहित्यिक आलोचकों और शोधकर्ताओं ने गोलेन्द्र पटेल को हिंदी के दूसरे कबीर के रूप में स्वीकार किया है। हालांकि उनके व्यक्तित्व और काव्यशैली में भिन्नताएँ हो सकती हैं, लेकिन उनके लेखन की सामाजिक भूमिका और उद्देश्य में गहरी समानता है। वे दोनों ही कवि अपने समय और समाज की सच्चाई को उजागर करने के लिए प्रतिबद्ध थे। इसलिए, यह कहना कि गोलेन्द्र पटेल हिंदी के दूसरे कबीर हैं, एक साहित्यिक आलोचना है जो उनकी कविता में सामाजिक जागरूकता, करुणा, प्रेम और सत्य की खोज को महत्व देती है, जैसे कबीर ने अपनी कविताओं के माध्यम से किया था। अतः कबीर के साथ गोलेन्द्र पटेल की तुलना अधिक प्रासंगिक हैं। यह स्पष्ट है कि उनकी कविता में गहराई, विविधता और मानवीय मूल्यों का समावेश है, जो उन्हें हिंदी साहित्य में एक विशिष्ट स्थान दिलाता है। गोलेन्द्र पटेल एक समकालीन कवि हैं, जिनकी रचनाएँ, जैसे उनकी कृति *दुःख दर्शन*, आधुनिक सामाजिक मुद्दों—खासकर किसानों, मजदूरों और हाशिए पर पड़े समुदायों की पीड़ा—को उजागर करती हैं। उनकी भाषा भी सहज और जनसामान्य से जुड़ी हुई है, जो कबीर की शैली से मिलती-जुलती है। पटेल की कविता में सामाजिक न्याय और दुख के दर्शन पर जोर देखा जा सकता है, जो कबीर के कर्मकांड विरोध और मानवीय समानता के संदेश से कुछ हद तक मेल खाता है। निम्नलिखित बिन्दुएं पूरी तरह से गोलेन्द्र पटेल के साहित्यिक व्यक्तित्व और काव्य की गहरी समझ को दर्शाती हैं। गोलेन्द्र पटेल की कविताओं में सचमुच मानवीय जीवन दर्शन, जनपक्षधरता, सृजनात्मकता, और सम्यक दृष्टि का अद्वितीय मिश्रण मिलता है। वे न केवल समाज के विभिन्न पहलुओं की आलोचना करते हैं, बल्कि उस आलोचना के भीतर समाधान और सुधार की दृष्टि भी प्रस्तुत करते हैं।

1. **जनपक्षधरता और सृजनात्मकता**: गोलेन्द्र पटेल की कविताओं में जनसाधारण के जीवन के संघर्षों और उनकी परिस्थितियों का गहरा चित्रण होता है। वे हमेशा आम आदमी की आवाज़ को प्रकट करते हैं और समाज के निचले स्तर पर रहने वाले लोगों की समस्याओं पर ध्यान आकर्षित करते हैं। यही उनकी जनपक्षधरता की ताकत है। साथ ही, उनकी सृजनात्मकता उन्हें एक अनोखा कवि बनाती है, जो मौजूदा समाज के चित्र को नए और विचारशील तरीकों से प्रस्तुत करता है।

2. **समयदर्शिता और आध्यात्मिकता**: गोलेन्द्र पटेल के काव्य में समय की गति और सामाजिक परिवर्तनों का गहरा अवलोकन मिलता है। वे अपने समय के राजनीतिक और सामाजिक मुद्दों से सीधे जुड़े हुए होते हैं, और उनकी कविताएँ समय की सच्चाईयों और चुनौतियों को बयां करती हैं। साथ ही, उनके लेखन में आध्यात्मिकता की गहरी झलक भी मिलती है, जो मनुष्य की आत्मा, उसकी अनंत यात्रा और जीवन के शाश्वत सत्य से संबंधित होती है।

3. **करुणा, प्रेम, और मुहब्बत**: गोलेन्द्र पटेल की कविता में मानवता, करुणा, प्रेम और मित्रता की भावनाएँ स्पष्ट रूप से उजागर होती हैं। वे मानवीय संबंधों की गरिमा और प्रेम की शक्ति पर विश्वास करते हैं। उनकी कविताओं में प्रेम का संदेश होता है जो हर प्रकार की दीवारों को तोड़कर मानवता के सार्वभौमिक रूप को सामने लाता है। उनके यहाँ मित्रता और मुहब्बत का भाव सिर्फ व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में भी महत्वपूर्ण है।

4. **आत्मिकता**: गोलेन्द्र पटेल के यहाँ आत्मीयता का तत्व बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनकी कविता में एक गहरी संवेदनशीलता और आत्मीयता की अभिव्यक्ति मिलती है। यह आत्मीयता पाठक से सीधा संवाद स्थापित करती है और उसकी भावनाओं को छूने का काम करती है।

इस तरह, गोलेन्द्र पटेल की कविता का गहिरा मानवीय दृष्टिकोण और उनकी साहित्यिक भाषा उन्हें न केवल हिंदी साहित्य में बल्कि व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाती है। उनकी कविताएँ न केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे समाज के प्रति एक ज़िम्मेदारी और चेतना का भी संकेत करती हैं।

गोलेन्द्र पटेल एक समकालीन हिंदी बहुजन कवि हैं, जिनका जन्म 5 अगस्त 1999 को उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले के खजूरगाँव में हुआ। गोलेन्द्र पटेल की रचनाएँ सहज भाषा में गहरे विचारों को समेटती हैं। उनकी कविताओं में प्रायः ग्रामीण परिवेश, प्रकृति, और समाज के कमजोर वर्गों की आवाज प्रमुखता से उभरती है। उनकी लेखनी में परंपरा और आधुनिकता का संतुलन देखने को मिलता है, जो उन्हें एक विशिष्ट कवि बनाता है। गोलेन्द्र पटेल के कवि, अपनी जनपक्षधर्मिता, सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार और सरल, प्रभावशाली भाषा के लिए जाने जाते हैं। "तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव", "दुःख दर्शन", "मेरा दु:ख मेरा दीपक है", "जोंक", "किसान", "मज़दूर", "माँ", "पिता", "दक्खिन टोले का आदमी", "मित्र", "पेड़", "जन, ज़मीन, जंगल और जनतंत्र", "सोनचिरई का जन्मदिन", "किसान है क्रोध", और "बर्फ़ की कोहरिया" शामिल हैं। उनकी रचनाएँ आम जनमानस की पीड़ा, प्रकृति, और जीवन के सूक्ष्म पहलुओं को उजागर करती हैं।  न केवल साहित्यिक बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी गहरी छाप छोड़ती हैं। कबीर का प्रभाव सदियों तक फैला और उनकी कविता आज भी प्रासंगिक है।

अंत में, 

"गोलेन्द्र शिष्य बुद्ध का, कबीर मेरा नाउं।

गले बुद्ध के वचन, जित कहैं तित गाउं।।

गोलेन्द्र शिष्य कबीर का, तुकोबा मेरा नाउं।

हाथे कबीर के वचन, जित खीचैं तित जाउं।।"









साभार: Grok, ChatGPT, Gemini, Google, Facebook, Twitter X इत्यादि एवं अन्य AI.

नोट: संस्थान ने केवल और केवल व्यवस्थित तरीके से पठनीय प्रस्तुत किया है।

Monday, November 25, 2024

तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' के बहाने मनुष्यता की स्थापना : विनय विश्वा

 "तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' के बहाने मनुष्यता की स्थापना" 

"एक लंबी कविता है

'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव'

जहाँ सभ्यता और संस्कृति

इसकी देह और आत्मा हैं

मित्रता और मुहब्बत

इसकी बुद्धि और प्रज्ञा हैं

अनुभव और अभ्यास

परम अभिव्यक्ति की प्रज्ञात्मा हैं!"-गोलेन्द्र पटेल

कोरोजयी कवियों में गोलेन्द्र पटेल का नाम कनिष्ठिकाधिष्ठित है। गोलेन्द्र पटेल जो वर्तमान में काशी हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी में परास्नातक के छात्र हैं, जिनमें काव्य प्रतिभा कूट- कूट कर भरी है। उनकी चिन्तन की भावधारा भूत,भविष्य को देखती हुई वर्तमान के कलेवर में हिन्दी साहित्य के लिए नए रंग भर रही है। उम्र कम है जरूर लेकिन साहित्य के जैसे पुरनियाँ, पुरोधा लगते हैं। इन्हें वर्तमान में प्रथम सुब्रमण्यम भारती सम्मान और साथ ही रविशंकर उपाध्याय स्मृति सम्मान मिल चुका है और देश के अन्यान्य महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में अपनी रचनाओं से एक नया हिन्दी लोक गढ़ रहे हैं। इनकी कविता की भाषा शुद्ध गंवई है और उनकी कविताओं में किसान, मजदूर, जंगरैत स्त्रियाँ, खेत,पशु-पक्षी, घास-फूस, सूक्ष्म से सूक्ष्मतर तत्वों पर नजर पड़ती है जिस प्रकार नागार्जुन की कविताओं में है। ये अपनी परम्पराओं जड़ता और अपने ही इर्द -गिर्द से अपनी कविता के लिए खनिज लेते हैं । ' आपकी कविता शब्दों की प्रयोगशाला है' औऱ वस्तुतः जहां प्रयोग होगा वहां खनिज प्रचुर मात्रा में होगी ही अगर नहीं होगी तो हवा(ऑक्सीजन, हाइड्रोजन) का मिश्रण कर जिस तरह जलधारा बनाई जाती है वैसे ही कवि गोलेन्द्र की हर एक कविताओं में नित नए शब्दों का प्रयोग हुआ है और यह यूँ ही नहीं है एक विशेष अर्थ भी छोड़ता है जो हिन्दी साहित्य शब्दकोश में बढियाती सार्थक शब्द नजर आती है।

     यहाँ हम कवि गोलेन्द्र की हिन्दी साहित्य में अब तक की सबसे लम्बी कविता 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' की समीक्षात्मक वर्णन करेंगे। उससे पहले हम हिन्दी की परम्पराओं में जाएंगे और बहुत दूर नहीं आधुनिक समय में छायावादी कवियों से शुरू करते हैं । छायावादी कवियों में सुमित्रानंदन पंत से शुरुआत करते हैं, इनकी 'परिवर्तन' कविता जो पल्लव में 1924 ई में छपी है में कवि प्रकृति को मानवीकरण बनाते हुए अपने तत्सम रूपी शब्दों से एक नया सौंदर्य शब्दचित्र गढ़ते हैं जैसे- 

  "आधि,व्याधि,बहु वृष्टि,वात,उत्पात,अमंगल,

     वह्नि,बाढ़, भू-कम्प,-तुम्हारे विपुल सैन्य दल;

आहे निरंकुश! पदाघात से जिनके विह्वल 

    हिल- हिल उठता है टल-मल

    पद-दलित धरा-तल!

'परिवर्तन' कविता निराशा की केंद्रीय मनोदशा को अनेक मुक्तक छंद में परोसती है। आगे जैसे बढ़ते हैं 'जयशंकर प्रसाद' की लम्बी कविता 'प्रलय की छाया' (1933,लहर से) जिसमें नाटकीयता ,ऐतिहासिक इतिवृत्त पर आधारित है जो आख्यानपरक है,वही 'राम की शक्तिपूजा'(1937,अनामिका से) रामकथा के आख्यान से अपना उपजीव्य ग्रहण करती है।

    शब्दों के समायोजन से भी हिन्दी की उत्तरोत्तर विकास को देखा जा सकता है -

    "लौटे युग-दल। राक्षस -पतदल पृथ्वी टलमल"

                                                        - राम की शक्तिपूजा

यह शब्दांश 'परिवर्तन' में भी आई और उसके बाद की कविता 'राम की शक्तिपूजा ' में भी देखी जा सकती है वैसा ही शब्दों का मेल मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' और गोलेन्द्र पटेल की कविता 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' में देखने को मिलेगी भले ही उसका अर्थ- विन्यास अलग हो पर उपजीव्यता ,परम्परा को जोड़ते हुए एक नया वितान रचना ही एक रचनाकार की सफलतम उपलब्धि है।

इसी लम्बी कविता की श्रृंखला में अज्ञेय की 'असाध्य वीणा'(1961 ई) जो आख्यान के रूप में हैं और प्रयोगवाद के प्रारंभिक दौर और कुछ समय पश्चात नई कविता का दौर आता है तो कविताएं अब यहां पूरी तरह धरातल पर हो जाती है और जनतंत्र की बातें कवि अपनी कविताओं में धड़ल्ले से करते हैं। साठोत्तरी के समय गजानन माधव मुक्तिबोध की लंबी कविता 'अंधेरे में ' एक नए कलेवर में हिन्दी कविता में आती है, जो आत्मचेतस, कविता में कविता ,फ्लैश बैक/फंतासी होते हुए देश, जनतंत्र, मनुष्य की बातें रखते हैं और उससे आगे धूमिल के यहाँ 'पटकथा' में कविता पूरी तरह से खुल जाती है और यह लम्बी कविता की श्रृंखला राजकमल चौधरी(मुक्ति-प्रसंग), रघुवीर सहाय(आत्महत्या के विरुद्ध), लीलाधर जगूड़ी(बलदेव खटिक) से होते हुए गोलेन्द्र पटेल (तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव) तक आती है।

'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' अब तक की हिन्दी की सबसे लम्बी कविता है जिसकी रचना वर्ष 2020 है, उस वक्त गोलेन्द्र स्नातक के छात्र थे। जो कोरोजीवी की उपज है, जो अपनी परम्पराओं और सभ्यता को जोड़ते हुए चलती है। यह कविता एक यात्रा की तरह है जिसमें कई पात्र और पड़ाव है, जो मनुष्यता का बोध कराती हैं। एक व्यक्ति जो बुजुर्ग है वो अपनी सभ्यता-परम्परा को ढोने वाला है, वहीं आगे चलकर शोधार्थी के आरेखों में भी दिखाई देता है, जो कहीं न कहीं नए को अपनी पुरातनता को याद और उससे जुड़ने की बात करता है । इस कविता को पढ़ने के पश्चात ऐसा लगता है कि यह मुक्तिबोध की कविता'अंधेरे में' की अगली कड़ी है, वहां 'फंतासी' है यहां 'फ्लूअन्सि' है। समाज में जो घटनाएं घटित हो रही है देश, समाज, जनता ,जनतंत्र हर एक पर दृष्टि पड़ी है कवि की।भौतिकता, काम-वासना, प्रेम इत्यादि बिम्बों का वितान देखने को मिलता है । यह कविता संवाद रूप में चलती है और वह भी एक प्रौढ़ पढा-लिखा शोधार्थी के रूप में जो अपनी सभ्यता और संस्कृति की पड़ताल करने निकला है जो भारत देश में अब हम खुद उसे कहीं न कहीं छोड़ रहे हैं इस बाज़ारवाद में । उसी विरासत को सहेजने की एक सफल कोशिश कवि करते हैं इस उजाड़ होती सभ्यता ,संस्कृति, भयावह होता घर-परिवार, खतरनाक होती राजनीतिक मूल्यों को।

कविता की कुछ पंक्तियों को उधृत करते हुए देखेंगे पहली ही पंक्तियों में अपनी सभ्यता और संस्कृति को समन्वित करने की बात होती है, एक शोधार्थी के द्वारा जो नए जमाने का है ,और उस रास्ते में अब इतनी कँटीली झाड़ियां उग आई हैं कि उसे साफ करने में समय लगेगा पर विश्वास है। वह कँटीली झाड़ियां (जो प्रतीक है), असभ्य होता समाज,भाषा, मानवीय मूल्य सभी ओर इंगित करता है ,खासकर भाषा की बड़ी ही दुर्दशा हुई है जिसके कारण कँटीली झाड़ियाँ उग आई हैं जो राह चलते देह को छिल देती है पहली ही पंक्ति में कवि समस्या को खड़ा करते हैं और उसके निदान के लिए जो आत्मा,चेतना ठहर सी गई है उसे एक नई दृष्टिबोध के द्वारा जाग्रत होने की बात करते हैं इससे पता चलता है कि कवि कितना जाग्रत अवस्था में हैं।

"सभ्यता और संस्कृति की समन्वित सड़क पर/ निकल पड़ा हूँ शोध के लिए /झाड़ियों से छिल गई हैं देंह / थक गए हैं पाँव कुछ पहाड़ों को पारकर/सफर में ठहरी है आत्मा/ बोध के लिए"

यहां मुक्तिबोध की कविता 'अंधेरे में' का एक अंश देखते हैं -

   "वह रहस्यमय व्यक्ति /अब तक न पाई गई मेरी अभिव्यक्ति है/पूर्ण अवस्था वह / निज- सम्भावनाओं,निहित प्रभावों ,प्रतिमाओं की मेरे परिपूर्ण का आविर्भाव /हृदय में रिस रहे ज्ञान का तनाव वह/आत्मा की प्रतिमा"।

यहाँ ज्ञान का तनाव हृदय में रिस रहा है और आत्मा प्रतिमा में स्थापित हुई है ,जबकि 2020 में गोलेन्द्र की कविता में अब वह बुद्धि को लिए हुए लिखे का शोध करने जा रही है नए दृष्टिकोण से जो परिपक्वता की निशानी होगी,जहां सहेजना ,समेटना,कुछ खुरदुरे को चिकना करना होगा।

मुक्तिबोध के यहाँ बरगद का पेड़ है और गोलेन्द्र के यहाँ भी जो बरगद एक प्रतीक है वट- वृक्ष पूरा राष्ट्र भारत है ,जहां मुक्तिबोध के यहाँ व्यक्ति खड़ा है ,नौजवान है पर यहाँ अब वहीं बरगद (विशाल वृक्ष) है लेकिन वह व्यक्ति अब बूढा हो गया है बैठा है जंग लग गया है उसे एक सहारे की जरूरत है जहाँ गोलेन्द्र की कविता में एक शोधार्थी के रूप में मौजूद है।

  "मैं इस बरगद के पास खड़ा हूँ

   कंधे पर बैठ गया बरगद पात एक

बरगद-आत्मा का पत्र है वह क्या?

      कौन सा इंगित"?

                         - मुक्तिबोध

"बरगद के नीचे बैठा कोई बूढा पूछता है 

      अजनबी कौन है?

 जी, मैं एक शोधार्थी हूँ"।

                            - गोलेन्द्र

'शोधार्थी' जिसके कन्धों पर बड़ी जिम्मेदारी है। वह उस प्रथम प्रेम का साक्ष्य ढूंढ रहा है जो कबीर के ढाई आखर प्रेम में था जो इस आधुनिकता/भौतिकतावादी/बाजारी दुनियां में कहीं खो गई है उसे वह बेचैनी से ढूंढ रहा है क्योंकि नए पीढ़ी पर बड़ी जवाबदेही है इसलिए उसे अब सजग रहना होगा। कवि की जड़े इतनी गहरे होते जा रही हैं जिससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि बिना अपने अतीत अपनी जड़ों में गए वर्तमान को सुदृढ़ नहीं कि जा सकती जो दस्तावेज रूप में है उसे उलट-पुलट कर देखनी होगी क्योंकि अतीत की ही प्रतिकृति वर्तमान है।

 "सोच के आकाश में/देख रहा है/अस्थियों के औज़ार/ पत्थरों के बने हुए औज़ारों से मजबूत है।"

कवि की चेतना इस कविता में हर उस पहलू को स्पर्श करते चलती है जो एक स्वस्थ राष्ट्र समाज के निर्माण में महत्ती भूमिका होती है जिसमें (समाज, वातावरण, पर्यावरण, जनतंत्र, हासिए के लोग,नैतिक मूल्य, राष्ट्र) और भविष्य की ओर निगाहें हैं।

एक पंक्ति देख सकते हैं आज की भयावहता को लेकर जो सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा है जलवायु परिवर्तन जो पुरी दुनिया में असर डाले हुए हैं अभी ताजा उदाहरण पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान में भीषण बाढ़ के रूप में देखी जा सकती है और वही ग्लेशियर का पिघलना ,मौसम का बदलना,सूखा पड़ना ये सारी समस्याओं को अपनी कविता में दर्ज करते हैं जो मानव विकास की अंधी दौड़ में इतना सरीक हो गया है कि वह अपने घर को ही भूल गया है जो एक कवि चिंता कर रहा है पर्यावरण को बचाने की कोशिश-

"जंगल के विकास में/इतिहास हँस रहा है/पेड़-पौधे कट रहे हैं/पहाड़-पठार टूट रहे हैं/ नदी-झील सूख रही है/ सड़कें उलट रही है/सागर सहारा का रेगिस्तान हो रहा है"।

कहीं ऐसा प्रकृति का प्रकोपभाजन न हो जाय की दूसरा 'मृतकों का टीला' बन जाए,इस पर गम्भीरता से पूरी मानव जाति को विचार करनी होगी तभी एक स्वस्थ समाज और राष्ट्र का निर्माण हो सकता है, क्योंकि प्रकृति बची रहेगी तो मानव जाति बनी रहेगी।

कवि का चिंतन व्यापकत्व के कैनवास पर अपने शब्दों से एक वृत्तचित्र बनाते नज़र आती है जो सभ्यता और संस्कृति के समन्वित सड़क पर चलते हुए मनुष्य को मनुष्य बनाने की जो पहल है उन सारे दृश्यों को अपनी लेखनी से उकेरने की एक सफल कोशिश की गई है।

"प्रकृति से होते हुए नारी/पुरुष तक,आदिवासी समाज(हासिए के लोग) से होते हुए शिष्ट समाज तक,गुरु से होते हुए शिष्य और सच्चे मित्र तक" आते हैं जो मनुष्य को मनुष्य होने के लिए पर्याप्त है।

कवि संदिग्ध इतिहास में न जाते हुए सीधे वर्तमान में उतरते हैं जो आवश्यक है जिस 'आदिवासी-विमर्श', जल-जंगल-जमीन की बात होती है वहाँ से शुरुआत करते हैं आजादी के इतने साल बीत जाने के बाद भी उनकी स्थिति वैसी ही है यह सोचने का विषय है। 

कवि उनके बारे में बताने की सफल कोशिश करते हैं कि आदिवासी समाज कितना सच है जो हम अपने आपको शिष्ट समझते हैं उनकी भाषा रहन-सहन पर हँसते हैं जबकि हम खुद को देवता कहते हैं जो कि सत्य नहीं है हम कितने असभ्य हैं ये हम खुद ही जानते हैं (हमे सुधरना होगा ) यहां एक प्रकार से व्यंग करते हैं-

   "ये वनजाति

(अर्थात आदिवासियों के पूर्वज)

हम देखने में देवता हैं

   ये राक्षस

   लेवता हैं

खैर,ये सच्चे इंसान हैं।"

हमें इन आदिवासी, पिछड़े समाज को लेकर चलने की बात करते हैं उनपे हँसने की बजाय।

वर्तमान समय में पितृसत्तात्मक(पुरूष वर्चस्ववादी) समाज में जिस तरह 'नारी-विमर्श'की बातें हो रही है आए दिन,उस नारी समाज को पकड़ने की कोशिश अपनी कविताओं में करते हैं,आज एक बड़ा प्रश्न-चिन्ह खड़ा होता है कि लड़कियां अपनी संस्कृति को भूलकर सात्विक प्रेम को भुलाकर दैहिक(मांसलवाद) सुख की ओर प्रवृत्त हो रही हैं और ऐसा पुरुष समाज भी कर रहा है जो एक सभ्य समाज के लिए ठीक नहीं है। उसे स्वस्थ (सुधार की जरूरत)होने की बातें कहते हैं ।

             " माँ से

    क्या आप मुझे जीने देंगी

      अपनी तरह

   क्या मैं स्वतंत्र हूँ?

अपना जीवनसाथी चुनने के लिए

       आपकी तरह।

मुहब्बत के मुहूर्त में मिलना है पिछवाड़े

            प्रियतम से

       आड़े- आड़े......

कवि गोलेन्द्र उस नारी-शक्ति की बात करते हैं जो आए दिन घरों में,तलाक को लेकर कचहरियों में ,पुरुष समाज से प्रताड़ित होते देखी जाती है जो स्वस्थ समाज के लिए जघन्य है, जिसे प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों, कहानियों, में स्थापित करने की कोशिश की औऱ उसी विषय को उत्तर छायावादी रचनाकार राष्ट्रकवि दिनकर अपने निबन्ध 'अर्धनारीश्वर'में उठाते हैं और आधुनिक महिला साहित्यकार भी इस मुद्दे पर जोर दी हैं ,उसी समस्या को एक बार फिर अपनी कविता के माध्यम से 'कोरोजीवी',किसान कवि गोलेन्द्र पटेल उठाते हैं और सभ्य कहने मानने वाले पुरुष पर चोट करते हैं और मनुष्य को मनुष्य होने की बात करते हैं।

"एक असुर का कहना है/ की पत्नी का क़ातिल होना/ असल में आदमी की आदमियत की मृत्यु होना है/कम से कम इस संदर्भ में /हमारी जाति/अभी कलंकित नहीं हुई है/यानी हमें देवत्व का दम्भ त्याग कर /असुरों की अच्छाई अपनाना चाहिए/तभी/हम सही अर्थ में मनुष्य हो पाएंगे।"

मनुष्यता का अब न होना चिंता सता रही है, और मनुष्य वही है जो दूसरों के लिए समर्पित हो लेकिन कवि को विश्वास है कि जो शेष बचे हैं वही इस धरा-धाम पर मनुष्यता को गढ़ सकते हैं, इसमें कवि का अपना जीवन संघर्ष भी है और सुपथमार्गी मित्र का होना भी जीवन में जरूरी बताते हैं।

 "सपनों का मरना/ जीते जी जिंदा लाश हो जाना है"

कवि की जड़ता की यह पहचान है कि वे अपने लोक/परम्परा को मजबूती से पकड़े हैं वे प्रेमचंद, निराला, मुक्तिबोध, धूमिल तक जाते हैं और भक्ति काल में जायसी,तुलसी,कबीर तक जाते हैं-"नाव में नदी को लेकर"।

प्रेम के सहारे पाप-पुण्य तक जाना जो जीवन की अंतिम परिणति है वहाँ तक कवि जाते हैं अपने वेद उपनिषद में जहां से दर्शन लेते हैं -

"वासना के वृक्ष पर बैठे /दो पंक्षी/ देखते हैं कि/वे अपनी बेचैनी को बाँध कर/बहा दिए हैं/नदी में।"

यहाँ प्रतीक के माध्यम से एक दर्शन है , वासना रूपी शरीर जो एक वृक्ष है जिसपर दो पंक्षी बैठा है एक शीर्ष पर और एक नीचे,शीर्ष पर वाला साक्षी है वह सिर्फ देखता है जबकि नीचे वाला वह कर्ता है वह बेचैन है कि क्या कमा लूं, क्या बना लूं, क्या बचा लूं आदि इस भौतिक सुख के लिए उसे तृप्ति नहीं है। 

धर्म का एक नैतिक रूप है जो नीचे की पंक्षी को बदलने की कोशिश करता है, और धर्म का परम रूप आध्यात्मिक होगा।

"धर्म का जो अध्यात्म है वह कहता है कि तुम्हारे भीतर एक साक्षी (देखने वाला)है क्योंकि साक्षी का जन्म नहीं होता,यह तो कर्ता है जो जन्म में भटकता है, क्योंकि मरते वक्त तुम्हारी वासना तृप्त नहीं होती।

'वासना की डोर तुम्हें नये जन्म में ले जाती है उसी नदी की तरह'।

प्रेम की पराकाष्ठा जहां सूफी दर्शन है और साथ ही जो ज्ञान में परिवर्तित होता है जो कबीर के यहाँ दिखता है।

 कवि बार-बार अपनी जड़ों से खनिज लेकर नए प्रयोग नए साहित्य को गढ़ रहे हैं।

इक्कीसवीं सदी का सबसे भयावह समय कोरोना महामारी का समय लॉकडाउन की स्थिति और नदियों में जो लाशें बह रही थी। जिसकी चीत्कार हर घर में दहाड़ मार रही थी, जो इस भयावह समय की याद दिलाती रहेगी, इसी समय बहुत से मजदूर लौट रहे हैं

यहां चलना क्रिया और लौटना क्रिया की अच्छी पड़ताल की गई हैं, वहाँ लौटना इतिहास में लौटना था जिसका इतिहास मनुष्यता की लहू से लिखा जा रहा है और एक तरफ चलना क्रिया जीवन की सार्थक क्रिया है जब चलेंगे नहीं तो इतिहास कैसे बनाएंगे।

' मनुष्यता की लहू से इतिहास का लिखना'

आज जनतंत्र का राजा जिन्न बन के खड़ा है जो सभी को अपनी माया से जला रहा है।

यहां मनुष्य की उत्कट जिजीविषा ही है जिससे कोरोजीवी सार्थक है । इस महामारी में पूरी कायनात बदल रही है जिसमें भाषा ,शब्द,अर्थ,मुहावरे इत्यादि के बदलते स्वरूप दिखाई दे रहे हैं और नए-नए विमर्श खोले जा रहे हैं। गोलेन्द्र पटेल की कोरोजीवी कविता में नई सम्वेदना,रागानुरागी प्रवृत्ति, जनपक्षधरता,मुक्ति मार्ग,मन-मस्तिष्क में नई ऊर्जा संचार भरते हुए चलती है एक बेचैनी है बदलाव की "कोरोजीवी से कोरोजयिता तक"।

कवि जिस गुरु से सीख रहे हैं उस परम्परा को बरकरार रखना चाहते हैं न की शिक्षक दिवस मना कर भूलने जैसी बात। कवि सृजनात्मक साधना अर्थात कर्म पर ध्यान देने की बात करते हैं क्योंकि सार्थक कर्म ही जीवन की सार्थक उपलब्धि है। श्रद्धा,भक्ति बाद में पहला कर्तव्य कर्मरत/श्रमशील शिष्य होना । अगर शिष्य गुरु मानता है तो उनके सच्चे और अच्छे विचारों को लेकर चलना ही जीवन की सार्थकता है। जैसे स्वामी विवेकानंद के गुरु रामकृष्ण परमहंस उस गुरु शिष्य परम्परा का होना जीवन की सर्वोत्तम शिष्य परम्परा है अपने और राष्ट्र के लिए।

"शिष्य सर्जक की भूमिका में/गुरु की रचना से गुजरते हुए केवल और केवल सृजनात्मक साधना पर ध्यान दे/ न कि साधन और साधक पर/न कि श्रद्धा और भक्ति पर /न कि शिष्य के प्रति उनकी सहजता पर।"

इस संसार का सबसे अनमोल रिश्ता 'मित्रता'है कवि चलते-चलते उस रिश्ते को अपनी कविता में रेखांकित करते हैं। हम मनुष्य अपनी अंतरतम की बातें, यादें एक सच्चे मित्र से ही कहते हैं चाहे वह घोर निराशा वाली बातें हो या खुशी की बातें। मित्रता को 'तिमिर में ज्योति ' की उपमा दे रहे हैं और एकाकार हो जाने की बातें करते हैं।

    "तुम्हारा होना 

    असल में मेरा होना है"

कोई भेद रह ही नहीं जाता है कितना विराट हृदय है कवि का।

'मित्रता और मुहब्बत' इस संसार में मानव के लिए अनमोल ख़जाने की तरह है जिसे मिल जाए तो दुनियां सच में जन्नत हो जाए। उस मित्रता और मुहब्बत में 'विश्वास' रूपी एक डोर है जो पूरी सृष्टि को बाँधे रखती है।

हिंदी साहित्य के इतिहास में लम्बी कविताओं का जब भी जिक्र किया जाएगा तब इक्कीसवीं सदी के कोरोजयी कवि 'गोलेन्द्र पटेल' का नाम जरूर लिया जाएगा। यह कविता कवि के चिंतन की सर्वश्रेष्ठ उपज है जो दूषित होती मनुष्यता,पर्यावरण, परिवेश, लोक,जनतंत्र, समाज आदि मूलभूत चीजों को ध्यान में रखते हुए एक सम्पूर्ण जन्नत भरी लोक रचते हैं जहाँ सिर्फ मनुष्य ही नहीं पर्यावरण, पशु-पक्षी,प्रकृति, रिश्ते हर जगह साम्य, सौम्यता, प्रेम हो। 

जिस प्रकार रैदास 'बेगमपुरा' की कल्पना करते हैं, कबीर तोड़-फोड़ कर सुधार करने की कोशिश करते हैं ,सुदामा पांडेय धूमिल एक नए 'प्रजातंत्र' की बात करते हैं ठीक उसी प्रकार कवि गोलेन्द्र पटेल एक नए समाज, राष्ट्र,लोक की बात करते हैं अपनी कविता 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' में। यह मात्र एक रचना कृतिकार को स्थापित करने में काफी है, जैसे बिहारी 'बिहारी के दोहे' लिखकर अमर हो गए। फिर भी रचनाकार बैठता कहां है। उसकी चिंतन तो नए-नए आयामों को छूते रहती है।

'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' यह शीर्षक ही अपने आप में कुछ कह जा रही है, जो हमारे भारतीय परम्परा संस्कारों में निहित है जब हम किसी (आत्मीय) को आशीर्वाद देते हैं तो अपनत्व की भाव जन्म लेती है ।

जैसे बड़े बुजुर्ग(पुरखें) आशीर्वाद देते हैं- बनल रहअ।

यह लम्बी कविता आख्यानों,काव्य खण्ड की तरह न होकर वर्तमान परिस्थितियों घटनाओं को लेकर रूपक की तरह चलती है कविता में कविता गढ़ते हुए जिसमें भावों की अभिव्यक्ति, अभिव्यंजना है जहाँ भाषा ,शब्द,अर्थ सबका रूप बदलता हुआ जान पड़ता है। कविता नदी की धारा की तरह प्रवाहित होती चली जा रही है। कहीं ठहराव नहीं है। जिसका उत्स सभ्यता, संस्कृति, परम्पराओं में निहित है, जिसका उत्स और उत्कर्ष यति में नहीं, गति में है। यह कविता हमारे समय का प्रत्याख्यान और हमारी चेतना का मानचित्र बन चुकी है । दूसरे शब्दों में, "गोलेन्द्र पटेल की काव्यभाषा उनकी विचार-संवेदना की सच्ची अनुगामिनी है। वे भाषा का नया मुहावरा गढ़ने वाले कवि हैं। कोरोजीवी कविता में उनकी संवेना और सोच जनपक्षधरता और उसकी मुक्ति की आकांक्षा है। उनकी कविताओं से गुज़रने के बाद हम अपने मन-मस्तिष्क में नवीन ऊर्जा को महसूस करते हैं। अतः 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' गोलेन्द्र पटेल की कविता हमारे समय के स्वभाव और स्वरूप का केंद्रीय रूपक या प्रतिनिधि पाठ है।"

सभ्यता और संस्कृति का समन्वय अपनी जड़ों की ओर जाना वहां से खनिज लेते हुए प्रकृति का सानिध्य प्राप्त करना जहां लोग प्रकृति से कटते जा रहे हैं। इस वर्तमान समय में आजादी के पचहत्तर सालों बाद भी आदिवासी ,हासिए के समाज पर ध्यान न देना उन्हें असभ्य समझना ,जिसको लेकर कवि सभ्य औऱ असभ्य(आदिवासी) समाज को स्थापित करना चाहते हैं। इस संसार का सबसे अनमोल व्यक्ति(नर-नारी) में मेल कराना जो 'अर्धनारीश्वर' बन जाए इसकी स्थापना, गुरु-शिष्य की स्थापना(मूल रूप से कर्तव्य) और सच्ची मित्रता स्थापित करना यह कवि का अपना कैनवास है ।

कवि की भाषा सहज और सरल है अपने गंवई (देशज) परम्पराओं से ली हुई शब्दों को स्थापित करने की कोशिश है, अनुप्रास अलंकार ,बदलता मुहावरा, और नए शब्दों का निर्माण बखूबी देखी जा सकती है। जैसे- लोचन की लय में लेह,आह रे माई,प्रेम की 

पईना, घास,आड़े-आड़े,नेह, मेह ,भँवर के भाव में व ताव में, रेह,गेह,बेना, सेना,सरसराहट, हम देखने में देवता हैं ये राक्षस लेवता हैं, नाउन, मेहरारू, इतवार,लीख, बलम,होलापात,गठरियाँ, चपलवा,खटिया,बाधी,पाटी, भरकुंडी, ढीठ,छाँह,रहिया,हमार हिरवा,जैसे अनगिनत शब्दों का प्रयोग हुआ है यह कवि का खनिज है जहाँ से लेते हैं।

यहां कवि, रैदास की तरह सहज और सरल भाषाई अर्थों में अपनी बातें कहते हैं कबीर व धूमिल की तरह प्रतिरोधी नहीं।

'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' हिंदी साहित्य की एक मुकम्मल लम्बी कविता है जो सही अर्थ देती है जिसमें मानवीय मूल्यों की सजग अभिव्यक्ति हुई है, मनुष्य होने की सर्वश्रेष्ठ रचना है।

                   © विनय विश्वा

    युवा कवि, लेखक, शोधार्थी सह शिक्षक

         07/09/22

पूर्व छात्र- काशी हिंदू विश्वविद्यालय (हिंदी विभाग)

शोध छात्र- जेपी यूनिवर्सिटी 

संपर्क सूत्र :-

नाम : गोलेन्द्र पटेल (युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक)

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, तहसील-मुगलसराय, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com


Monday, October 16, 2023

युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की कविताएँ (Yuva Kavi Golendra Patel Kee Kavitaen)

 युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की 13 कविताएँ :-

1).


*हम माटी के प्रेमी किसान हैं*

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गाय, बैल, ट्रैक्टर, थ्रैशर, खेत व खलिहान हमारी पहचान हैं

हमारे बेटे सरहद के जवान हैं

हमारी हथेलियों में कुदाल, खुरपी, फ़रसा व हँसिया के निशान हैं

हम माटी के प्रेमी किसान हैं।


हम धूल, धुआँ, कुआँ व जुआ के गान हैं

हमारे गीतों में गोभी, गन्ना, गेहूँ व धान हैं

हम इनसान के स्वाभिमान हैं

हम माटी के प्रेमी किसान हैं।


तुम्हारी दृष्टि में देव, हम क्यों प्रकृति के क़रीब हैं?

हम क्यों भूखे नंगे ग़रीब हैं?

हम क्यों अनपढ़, गँवार व नादान हैं?

हम माटी के प्रेमी किसान हैं।


हममें क्या कमी है? हमारी भाषा में नमी है

हमारी संस्कृति श्रम की कोख से जन्मी है

हम देश की आन बान शान हैं

हम माटी के प्रेमी किसान हैं।



2).




*मेरा दुःख मेरा दीपक है*

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जब मैं अपने माँ के गर्भ में था

वह ढोती रही ईंट

जब मेरा जन्म हुआ वह ढोती रही ईंट

जब मैं दुधमुंहाँ शिशु था

वह अपनी पीठ पर मुझे 

और सर पर ढोती रही ईंट


मेरी माँ, माईपन का महाकाव्य है

यह मेरा सौभाग्य है कि मैं उसका बेटा हूँ

मेरी माँ लोहे की बनी है

मेरी माँ की देह से श्रम-संस्कृति के दोहे फूटे हैं

उसके पसीने और आँसू के संगम पर

ईंट-गारे, गिट्टी-पत्थर,

कोयला-सोयला, लोहा-लक्कड़ व लकड़ी-सकड़ी के स्वर सुनाई देते हैं


मेरी माँ के पैरों की फटी बिवाइयों से पीब नहीं,

प्रगीत बहता है

मेरी माँ की खुरदरी हथेलियों का हुनर गोइंठा-गोहरा

की छपासी कला में देखा जा सकता है


मेरी माँ धूल, धुएँ और कुएँ की पहचान है

मेरी माँ धरती, नदी और गाय का गान है

मेरी माँ भूख की भाषा है

मेरी माँ मनुष्यता की मिट्टी की परिभाषा है

मेरी माँ मेरी उम्मीद है


चढ़ते हुए घाम में चाम जल रहा है उसका

वह ईंट ढो रही है

उसके विरुद्ध झुलसाती हुई लू ही नहीं, 

अग्नि की आँधी चल रही है

वह सुबह से शाम अविराम काम कर रही है

उसे अभी खेतों की निराई-गुड़ाई करनी है

वह थक कर चूर है

लेकिन उसे आधी रात तक चौका-बरतन करना है

मेरे लिए रोटी पोनी है, चिरई बनानी है

क्योंकि वह मजदूर है!


अब माँ की जगह मैं ढोता हूँ ईंट

कभी भट्ठे पर, कभी मंडी का मजदूर बन कर शहर में

और कभी-कभी पहाड़ों में पत्थर भी तोड़ता हूँ

काटता हूँ बोल्डर बड़ा-बड़ा

मैं गुरु हथौड़ा ही नहीं

घन चलाता हूँ खड़ा-खड़ा


टाँकी और चकधारे के बीच मुझे मेरा समय नज़र आता है

मैं करनी, बसूली, साहुल, सूता, रूसा व पाटा से संवाद करता हूँ

और अँधेरे में ख़ुद बरता हूँ दुख


मेरा दुख मेरा दीपक है!


मैं मजदूर का बच्चा हूँ

मजदूर के बच्चे बचपन में ही बड़े हो जाते हैं

वे बूढ़ों की तरह सोचते हैं

उनकी बातें 

भयानक कष्ट की कोख से जन्म लेती हैं

क्योंकि उनकी माँएँ 

उनके मालिक की किताबों के पन्नों पर 

उनका मल फेंकती हैं 

और उनके बीच की कविता सत्ता का प्रतिपक्ष रचती है।


मेरी माँ अब वही कविता बन गयी है

जो दुनिया की ज़रूरत है!



3).


खर जिउतिया पूजन

_____________________________________________


एक माँ की स्मृति जीवित होती है

जीवित्पुत्रिका व्रत से

अनंत दुआएँ द्वार पर आती हैं

सभी संतानें साँपों से बच जाती हैं मुश्किल सफ़र में

विषम समय का विख सोख लेता है सूर्य

गाँव दर गाँव गूँजता है तूर्य


जगत पर टिमटिमाते जुगनुओं की रोशनी में

अढ़ाई अक्षरों के प्रेमपत्र को पढ़ती हैं किशोरियाँ

किलकारियों के कचकचाहटी स्वर में गाती हैं कजरियाँ


“सर्वे भवंतु सुखिनः’ सिद्धांत है हवा के होंठों पर

 ऐ सखी! सृष्टि में फूल मरता है

 पर उसका सौरभ नहीं

 कलियाँ कंठों-कंठ कानों-कान सुनती रहती हैं

 भ्रमरियों की गुनगुनाहट

और आहत तन-मन की आहट

मसलन ‘जीवन का राग नया अनुराग नया”


बाहर धूल भीतर रेत है

अंधेरी आँधियों में मणियों का मौन चमकना

साँप-साँपिन के संयोग का संकेत है

ओसों से बुझ रही है घास की प्यास

साथ छोड़ रहा है श्वास


पर, पेड़ को पता है

पत्तियों के पेट में जाग रही है भूख

कहीं नहीं है सुख

सूख रहा है ऊख


आश्विन-कृष्णा अष्टमी को

जीमूतवाहन जन्नत का वास छोड़कर पृथ्वी पर आते हैं

गरुड़ गगनगंगा में मलयावती के साथ नौका विहार करते हैं

जहाँ ढेर सारे किसान बादलराग गाते हैं


नयननीर की नदियों में शांति है

पर आँखों में क्रांति है

लालिमा बढ़ रही है

टूट रहा है विश्वास

रोष के रस से लबालब भरा है गिलास


गर्भवती अनुभूतियाँ जन्म दे रही हैं स्मृतियों को

जिन्हें जीउतिया माई अमरता का आशीर्वाद दे रही हैं 

स्मृतियों के जीवित रहने से मनुष्यता जीवित रहती है


खैर, यह कोरोना के विरुद्ध छत्तिस घंटों का महासंकल्प है 


इस वायरस-वर्ष ने प्रेम में नजदीकियों को नहीं,

दूरियों के तनाव को स्वीकार किया है

स्पर्श से दोस्ती में दरार पड़ रही है

कच्ची उम्र की बुभुक्षा लड़ रही है


पर्व को परवाह नहीं किसी के जीवन से

मृत्यु नहीं रुकती है किसी के रोकने से

नहीं रुकती हैं

कभी-कभी ख़ुद से ख़ुद की दूरियाँ बढ़ने से

दूरियों के बढ़ने से मन खिन्न है


गँवई शब्द मृत्यु की गंध को सूँघ रहे हैं

मरने से पहले एकत्र होकर

एक ही अगरबत्ती के धुएं को फेफड़े तक पहुँचा रहे हैं

डर के विरुद्ध


व्रतधारिन बूढ़ी औरतें  

नयी नवेली बहुओं को उपदेश दे रही हैं

कि उज्ज्वल भविष्य की उम्मीद है उपवास


चील्होर था या उल्लू फुसफुसा रही है भीड़

परात का प्रसाद लौट रहा है

चूल्हे के पास


बच्चे हैं

कि गोझिया आज ही खाना चाहते हैं

खर व्रतधारिन समझा रही हैं

जिउतिया माई रात भर खईहन

हम सब सवेरे

(प्रसाद बसियाने पर शीघ्र शक्ति प्रदान करता है, वत्स!) 


बच्चे कह रहे हैं माई हमार हिस्सा हमें दे दे

नाहीं त रतिया में जिउतिया माई कुल खा जईहन

आज शायद ही छोटे बच्चे सो पाएंगे ठीक से

व्रत की बात हट रही है लीक से


यह लोकपर्व मातृशक्ति की तपस्या है!!



4).


*दूब*

______________________________________


ओ ओस के आँसू!

विपरीत परिस्थिति में

मैं उगी

यों— चेहरे पर उनके लिए ऊब हूँ

मैं हरी दूब हूँ!!



5).



*तीर्थायन*

______________________________________


सीर गोवर्धन से साबरमती का तीर्थायन

करते हुए

हमने जाना—“गाँधी के राम कौन हैं?

उन्हें चरखा किस संत ने दिया?

उन्होंने बुद्ध को कितना जिया?”



6).


*हिंदी*

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जब कोई बच्चा रोता है

उसकी माँ

उसे मना लेती है ;


हिन्दी हमारी माँ है

उसकी वर्णमाला

‘अ’ से ‘अनपढ़’ को अंत में

‘ज्ञ’ से ‘ज्ञानी’ बना देती है।


7).



*संतप्त क्रियाएँ*

______________________________________


एक आत्मा चीख रही है

दूसरी चिल्ला रही है

तीसरी चोकर रही है

चौथी अरई दे रही है

पाचवीं ओरिया रही है

छठवीं गरिया रही है

सातवीं बर्रा रही है

इन संतप्त आत्माओं में किस की क्रिया सार्थक है?



8).


*बहन का मतलब*

______________________________________


अंग्रेजी में ‘बहन’ को ‘सिस्टर’ कहते हैं

जिसका मशहूर मतलब है

‘स्वीट’, ‘इनोसेंट’, ‘सुपर’, ‘टैलेंटेड’, ‘एलिगेंट’ और ‘रिमार्केबल’


हिन्दी में बहन का पहला मतलब है

‘ब’ से ‘बज़्म’ है बहन 

‘ह’ से ‘हथौटी’ है बहन 

‘न’ से ‘नज़्म’ है बहन


बहन का दूसरा मतलब है

‘ब’ से ‘बल’ है बहन (भाई का)

‘ह’ से ‘हल’ है बहन (हर सवाल का)

‘न’ से ‘नल’ है बहन (पानी का)


बहन का तीसरा मतलब है

‘ब’ से बाप के लिए बधाई बन जाना 

‘ह’ से हक के लिए हथियार उठाना

‘न’ से नीच के लिए नाख़ून बढ़ाना


बहन! बहन का चौथा मतलब क्या है?

“दूसरे की बहन को अपनी बहन समझना!”

■ 


9).


*पहली कक्षा* (बाल कविता)

______________________________________


हम हर दिन पढ़ने जाते हैं 

हम सब यह गाते हैं

कलम के आगे झुकता है भाला

सबसे प्यारी है हमारी पाठशाला


हम पहली कक्षा के विद्यार्थी हैं

हमें याद करनी है गिनती

हमें याद करनी है वर्णमाला

सबसे प्यारी है हमारी पाठशाला


बोलो बच्चों एक साथ

जय जवान जय किसान जय विज्ञान


हम पहली कक्षा के विद्यार्थी हैं

हमें याद करना है राष्ट्रगान

हमें खोलना है दिमाग़ का ताला

सबसे प्यारी है हमारी पाठशाला


हम पहली कक्षा के विद्यार्थी हैं

हमें याद करनी हैं किताब की बातें

हमें बनानी है शब्दों की माला

सबसे प्यारी है हमारी पाठशाला


बोलो बच्चों एक साथ

जय हिन्द जय भारत!


10).


*हरियाली विहीन देश* (बाल कविता)

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वह देश हरियाली विहीन जंगल है, बच्चो!

जहाँ की सरकार शेरनी है और न्याय शेर

वह देश हरियाली विहीन जंगल है, बच्चो!

जहाँ अधिकार माँगने वाली जनता विषहीन बिरनी है

भेंड़ है, बकरी है, गाय है, भैंस है और हिरनी है

वह देश हरियाली विहीन जंगल है, बच्चो!

जहाँ नदी सड़क है और पहाड़ पोखरा

वह देश हरियाली विहीन जंगल है, बच्चो!

जहाँ हर घर प्लास्टिक के पेड़ पाये जाते हैं

वह देश हरियाली विहीन जंगल है, बच्चो!

जहाँ एक पौधा रोपते हुए कई बुद्धिजीवी तसवीर खींचाते है

वह देश हरियाली विहीन जंगल है, बच्चो!

जहाँ पंख के लिए पानी नहीं है और न ही चौपायों के लिए चारा

वह देश हरियाली विहीन जंगल है, बच्चो!

जहाँ हर पाँच साल पर गूँजता है मानवता का नारा।।



11).


*गुब्बारे* (बाल कविता)

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मैं बचपन से बेचता हूँ

प्यारे-प्यारे गुब्बारे

मैं बेचता हूँ आसमान के तारे

मैं बेचता हूँ चुनाव के नारे

मैं बेचता हूँ बच्चों का खेलौना

मैं बेचता हूँ तरह-तरह का खेलौना

मैं बेचता हूँ खेलौना

ले लो ना, खेलौना ले लो ना।


मैंने यह कसम है खाई

ये गुब्बारे किस्मत के मारे बच्चे सारे

निःशुल्क ले सकते हैं भाई

आओ! आओ!

खेलौना देखो!

जो मनभाये ले लो

पढ़ो-लिखो और खेलो!


गुब्बारे रंग-बिरंगे प्यारे-प्यारे

इतने सारे मैं लेकर आया हूँ 

गुब्बारे ले लो! गुब्बारे ले लो!...



12).


*खिलौने* (बाल कविता)

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अच्छे खिलौने

बच्चों के व्यक्तित्व को निखारते हैं


खिलौने, सीखने की प्रक्रिया में सहायक होते हैं

अक्सर मेले में अमीर माँ-बाप कहते हैं

“अच्छे बच्चे खिलौनें लेने के लिए नहीं रोते हैं!”


और गरीब माँ-बाप कहते हैं

“बेटा! चेलो आगे, इससे बढ़िया खिलौना दिलाऊँगा!”

जब कि सच यह है 

कि गरीबी बच्चे को हामिद बना देती है

हाँ, वही हामिद

जिसका चिमटा व्यवस्था को चुनौती देता है

जो कथा-साहित्य में अमर है

सुनो! बाँसुरी का कितना सुंदर स्वर है! 


देखो! ये चूल्हे पर चढ़े हुए कुकर सीटी मारते हैं

अच्छे खिलौने

बच्चों के व्यक्तित्व को निखारते हैं!



13).


*हमें चाहिए* (बाल कविता)

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हम मनुष्य हैं

हम देश हैं

हमें चाहिए

‘अ’ से अधिकार 

हमें चाहिए

‘क’ से किसान 

हमें चाहिए

‘ज’ से जवान

हमें चाहिए

‘व’ से विज्ञान

हमें चाहिए

‘स’ से संविधान

हमें चाहिए

‘ह’ से हक

हमें चाहिए

‘ज्ञ’ से ज्ञान

हम मनुष्य हैं

हम देश हैं!

नाम : गोलेन्द्र पटेल (लोकधर्मी कवि व लेखक)

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

Monday, October 9, 2023

धूमिल की कविताओं में जनपक्षधरता और भारतीय लोकतंत्र का स्वरूप

धूमिल की कविताओं में जनपक्षधरता और भारतीय लोकतंत्र का स्वरूप

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1). सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' का पुनर्मूल्यांकन

2). धूमिल : एक खोज

3). काव्य सिद्धांत और धूमिल का काव्य

4). जनपदीय कवि धूमिल की लोक संवेदना एवं मानवीय मूल्य

5). धूमिल के काव्य में मानव-मूल्य

6). धूमिल के गीतिकाव्य/गीत : आशा एवं संघर्ष का समवेत स्वर

7). धूमिल के साहित्य में लोकतंत्र का स्वरूप

8). धूमिल के साहित्य में उनकी सामाजिक पक्षधरता

9). धूमिल की काव्य-संवेदना

10). धूमिल की नज़र में कविता

11). धूमिल की रचना में दलित-जीवन और मानवाधिकार

12). धूमिल के साहित्य में भदेस शब्दावली

13). धूमिल की स्त्री-दृष्टि

14). विचारकों की नज़र में धूमिल

15). धूमिल की गद्य में सामाजिक परिवेश

16). धूमिल की रचनाओं में विन्यस्त समकालीन यथार्थ

17). धूमिल का रचना संसार : एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

19). धूमिल के काव्य का शैली वैज्ञानिक अध्ययन

20). धूमिल का लेखन : विस्तार और वैविध्य

21). धूमिल की रचनाओं में युगबोध

22). धूमिल की सौंदर्य-दृष्टि

23). धूमिल की कविताओं में प्रतिरोध का स्वरूप

24). धूमिल की कविता में आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना

25). धूमिल की कविता में लोकतंत्र की आलोचना

26). धूमिल : जनवादी चेतना

27). धूमिल की कविता में युगचेतना

28). धूमिल के गद्य साहित्य में सामाजिक चेतना और भाषायी सौंदर्य का समवेत

29). धूमिल का रचना संसार : युगबोध और मानवीय दृष्टि

30). धूमिल के गद्य साहित्य का पाठ विश्लेषण

31). धूमिल का गद्य साहित्य

32). धूमिल के गद्य साहित्य की वस्तु और शिल्प

33). धूमिल काव्य की भाषा एवं शिल्प

34). धूमिल का गद्य साहित्य और साठोत्तरी समय

35). सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' और उनका युगीन परिवेश

36). धूमिल के रचना संसार में विविध स्वर

37). धूमिल : विद्रोही पक्ष, प्रसांगिकता, भाषा, भाव-चेतना

38). धूमिल की रचनाओं में ग्रामीण संस्कृति के विविध आयाम

39). लोकधर्मी व जनकवि धूमिल का रचना संसार

40). कविता के कैनवस पर धूमिल का गद्य


लेखक : गोलेन्द्र पटेल (कवि व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी।)
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
मो. नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


【नोट: धूमिल से संबंधित कुछ सवाल और कुछ अन्य शीर्षक भीतर उथल-पुथल मचाये हैं. यदि आप धूमिल पर रिसर्च कर रहे हैं, तो आप अपने शोध का शीर्षक कॉमेंट बॉक्स में बता सकते हैं।】


 


Saturday, June 17, 2023

आदिकाल का नामकरण एवं प्रस्तोता

 

आदिकाल का नामकरण

प्रस्तोता

चारण काल

जॉर्ज ग्रियर्सन

प्रारंभिक काल

मिश्रबंधु

प्रारंभिक काल

गणपतिचंद्र गुप्त

बीजवपन काल

महावीरप्रसाद द्विवेदी

वीरगाथाकाल

रामचंद्र शुक्ल

सिद्ध-सामंत काल

राहुल सांकृत्यायन

वीरकाल

विश्वनाथ प्रसाद मिश्र

संधिकाल एवं चारण काल

रामकुमार वर्मा

आदिकाल

हजारीप्रसाद द्विवेदी

जयकाल

रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’

आधार काल

सुमन राजे

अपभ्रंश काल

धीरेंद्र वर्मा

उद्भव काल

वासुदेव सिंह

अंकुरण काल (जरमिनेशन टाइम)

गोलेन्द्र पटेल

शम्भुनाथ सिंह

उद्भवकाल, प्राचीन काल

रामखेलावन पाण्डेय

संक्रमणकाल

चंद्रधर शर्मा गुलेरी & राहुल सांकृत्यायन

पुरानी हिंदी का काल

कमल कुलश्रेष्ठ

अंधकारकाल

मोहन अवस्थी

आधारकाल

स्नातक सत्यकाम वर्मा

लोकोन्मुखी साहित्य का युग

विजयेंद्र स्नातक

वीर प्रशस्ति युग

रामप्रसाद मिश्र

संक्रांति काल

बच्चन सिंह

अपभ्रंशकाल : जाति साहित्य का उद्भव

श्यामसुंदर दास

वीरकाल (अपभ्रंश का)

 




गोलेन्द्रवाद क्या है? (What is Golendrism?)

  What is Golendrism? गोलेन्द्रवाद क्या है? Golendrism (गोलेन्द्रवाद) मानवतावादी दर्शन है। यह वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित है। यह मानवीय चे...