Thursday, February 26, 2026

समकालीन हिंदी कविता में गोलेन्द्रवाद का उद्भव, स्वरूप और सामाजिक प्रासंगिकता: गोलेन्द्र पटेल के काव्य-दर्शन का आलोचनात्मक अध्ययन

 

समकालीन हिंदी कविता में गोलेन्द्रवाद का उद्भव, स्वरूप और सामाजिक प्रासंगिकता: गोलेन्द्र पटेल के काव्य-दर्शन का आलोचनात्मक अध्ययन


सारांश (Abstract)

यह शोध आलेख समकालीन हिंदी कविता में विकसित एक नवीन वैचारिक प्रवाह ‘गोलेन्द्रवाद’ की संरचना, दार्शनिक आधार और सामाजिक प्रासंगिकता का विस्तृत अध्ययन प्रस्तुत करता है। इसका केंद्र युवा कवि एवं चिंतक गोलेन्द्र पटेल का काव्य-संसार है, जिसमें ग्रामीण जीवन, श्रम-संस्कृति, बहुजन चेतना और वैज्ञानिक मानवतावाद का समन्वित रूप दिखाई देता है। अध्ययन का उद्देश्य यह विश्लेषित करना है कि गोलेन्द्रवाद किस प्रकार “मित्रता, मुहब्बत, मानवता और मुक्ति” के चतुष्टय के माध्यम से एक समग्र जीवन-दर्शन का निर्माण करता है। शोध गुणात्मक पद्धति पर आधारित है, जिसमें कविताओं का पाठ-विश्लेषण, तुलनात्मक वैचारिक अध्ययन तथा सामाजिक संदर्भों की आलोचनात्मक व्याख्या की गई है। निष्कर्षतः यह प्रतिपादित किया गया है कि गोलेन्द्रवाद समकालीन हिंदी साहित्य में एक जीवंत, संश्लेषणात्मक और प्रतिरोधधर्मी दर्शन के रूप में उभरता है, जो बौद्ध, कबीरी, अम्बेडकरवादी और मार्क्सवादी परंपराओं से संवाद करते हुए एक स्वतंत्र वैचारिक पहचान निर्मित करता है।


बीज शब्द (Keywords): गोलेंद्र, गोलेन्द्रवाद, समकालीन हिंदी कविता, बहुजन चेतना, मानवतावाद, सामाजिक न्याय, काव्य-दर्शन, ग्रामीण यथार्थ।


1. प्रस्तावना (Introduction)

इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता में सामाजिक असमानता, जातिगत विभाजन, श्रम-शोषण और ग्रामीण जीवन के संकट प्रमुख विषयों के रूप में उभरे हैं। वैश्वीकरण और बाज़ारवाद के प्रसार ने साहित्यिक चेतना को भी प्रभावित किया है। इसी संदर्भ में गोलेन्द्र पटेल एक ऐसे युवा कवि के रूप में सामने आते हैं, जिनकी रचनाएँ केवल काव्यात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि एक वैचारिक प्रतिपक्ष का निर्माण करती हैं।


5 अगस्त 1999 को उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद में जन्मे और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र रहे पटेल ग्रामीण पृष्ठभूमि से आए रचनाकार हैं। वे स्वयं को ‘कोरोजीवी’ कहकर महामारी-कालीन अनुभवों को भी अपनी चेतना का हिस्सा बनाते हैं। गोलेन्द्र पटेल (क्रांतिकारी जनकवि, जनपक्षधर्मी लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक; शब्द-शिक्षक एवं दार्शनिक) समकालीन हिंदी साहित्य में अनेक उपनामों और उपाधियों से सम्मानित किए जाते हैं। उन्हें ‘गोलेंद्र ज्ञान’, ‘गोलेन्द्र पेरियार’, ‘युवा किसान कवि’, ‘हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय’, ‘काशी में हिंदी का हीरा’, ‘आँसू के आशुकवि’, ‘आर्द्रता की आँच के कवि’, ‘अग्निधर्मा कवि’, ‘निराशा में निराकरण के कवि’, ‘दूसरे धूमिल’, ‘काव्यानुप्रासाधिराज’, ‘रूपकराज’, ‘ऋषि कवि’, ‘कोरोजयी कवि’, ‘आलोचना के कवि’, ‘महास्थविर’, ‘अद्यतन कबीर’, ‘शब्द सुश्रुत’ तथा ‘दिव्यांगसेवी’ जैसे विशेषणों से भी जाना जाता है, जो उनकी बहुआयामी रचनात्मकता, सामाजिक प्रतिबद्धता और दार्शनिक चेतना को रेखांकित करते हैं।


यह शोध निम्न प्रश्नों की पड़ताल करता है—

1. गोलेन्द्रवाद की दार्शनिक संरचना क्या है?

2. इसके चारत्व का वैचारिक महत्व क्या है?

3. यह समकालीन हिंदी कविता में किस प्रकार हस्तक्षेप करता है?


2. साहित्य समीक्षा (Review of Literature)

समकालीन हिंदी आलोचना में सामाजिक न्याय और बहुजन विमर्श पर पर्याप्त कार्य हुआ है। दलित साहित्य, स्त्री-विमर्श और मार्क्सवादी आलोचना ने साहित्य के सामाजिक पक्ष को केंद्र में रखा।


भीमराव रामजी आंबेडकर की जाति-उन्मूलन की अवधारणा, कबीर की निर्भीक काव्य-भाषा तथा कार्ल मार्क्स की वर्ग-सचेतना ने हिंदी साहित्य को गहराई से प्रभावित किया।


हालाँकि, गोलेन्द्रवाद पर अभी व्यवस्थित अकादमिक शोध अल्प है। उपलब्ध लेखों में उन्हें “21वीं सदी का नया कबीर” कहा गया है, किंतु इस उपमा की समालोचनात्मक परीक्षा अपेक्षित है।


यह शोध इस रिक्ति (Research Gap) को भरने का प्रयास है।


3. कार्यविधि (Methodology)


शोध प्रकार: गुणात्मक (Qualitative)

स्रोत: कविताएँ—“मेरा दुःख मेरा दीपक है”, “किसान है क्रोध”, “मुसहरिन माँ”, “जोंक”, 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' (लम्बी कविताएँ), 'दुःख दर्शन' (लम्बी कविताएँ), 'कल्कि'( बहुजन खंडकाव्य), 'अंबेडकरगाथापद' (महाकाव्य), 'नारी' (लघु महाकाव्य), बहुजन महापुरुष और महापुरखिन आदि।


पद्धति: पाठ-विश्लेषण, तुलनात्मक वैचारिक अध्ययन, संदर्भात्मक विश्लेषण


सीमाएँ: कवि की समस्त अप्रकाशित सामग्री उपलब्ध नहीं।


4. गोलेन्द्रवाद की उत्पत्ति और शब्दार्थ

‘गोलेन्द्रवाद’ शब्द ‘गोलेन्द्र’ (पूर्ण चेतना का संकेत) और ‘वाद’ (विचारधारा) से निर्मित है। इसका सूत्रवाक्य है—

“गोलेन्द्रवाद मानवीय जीवन जीने की पद्धति है।”


यह दर्शन अनुभव से उपजता है। कवि का कथन—

“अनुभूति के संस्पर्श से जागृत चेतना दर्शन की उपज है।”


यहाँ दर्शन सैद्धांतिक नहीं, बल्कि अनुभवजन्य है।


5. गोलेन्द्रवाद का चारत्व


5.1 मित्रता में आधार

मित्रता सामाजिक ऊर्जा है। यह सामूहिकता का आधार बनाती है। ग्रामीण जीवन की साझी पीड़ा मित्रता के माध्यम से प्रतिरोध में बदलती है।


5.2 मुहब्बत में विस्तार

मुहब्बत भावनात्मक विस्तार है। “मुसहरिन माँ” में कवि लिखते हैं—

“धूप में सूप से धूल फटकारती मुसहरिन माँ को देखते / महसूस किया है भूख की भयानक पीड़ा।”

यह करुणा मुहब्बत का विस्तार है।


5.3 मानवता में सार

मानवता नैतिक केंद्र है। जाति-धर्म से निरपेक्ष समान गरिमा इसकी मूल धारणा है।


5.4 मुक्ति में उद्गार

मुक्ति चेतना का उत्कर्ष है। “मेरा दुःख मेरा दीपक है” में दुःख मुक्ति का माध्यम बनता है—

“मेरी माँ माईपन का महाकाव्य है।”


6. श्रम और दुःख का दार्शनिक रूपांतरण

गोलेन्द्रवाद श्रम को जीवन का केंद्र मानता है। “जोंक” कविता में—

“रोपनी जब करते हैं कर्षित किसान / तब रक्त चूसते हैं जोंक!”

यह प्रतीकात्मकता शोषण की संरचना को उद्घाटित करती है।


7. वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तर्कबुद्धि

गोलेन्द्रवाद अंधविश्वास का प्रतिरोध करता है। यह विवेक और आलोचनात्मक अध्ययन पर बल देता है।


यह दृष्टि अम्बेडकरवादी तर्कवाद और मार्क्सवादी भौतिकवाद से संवाद करती है।


8. भाषा और शैली


खड़ी बोली, भोजपुरी और लोक-प्रयोगों का मिश्रण

साधारण भाषा में गहन सत्य

प्रतिरोधात्मक व्यंग्य


यह शैली कबीर की साधुक्कड़ी की याद दिलाती है, किंतु समकालीन संदर्भों में विकसित है।


9. चर्चा (Discussion)

गोलेन्द्रवाद एक संश्लेषणात्मक दर्शन है। यह बौद्ध करुणा, कबीरी निर्भीकता, अम्बेडकरवादी समानता और मार्क्सवादी वर्ग-संघर्ष से संवाद करता है, किंतु अपनी स्वतंत्र पहचान बनाता है।


इसे केवल व्यक्तिवादी विचारधारा कहना उचित नहीं; यह सामूहिक मुक्ति की परियोजना है।


10. निष्कर्ष (Conclusion)

यह शोध प्रतिपादित करता है कि गोलेन्द्रवाद समकालीन हिंदी कविता में एक नवीन, समावेशी और मानवतावादी दर्शन के रूप में स्थापित हो रहा है।


इसका चारत्व-सिद्धांत जीवन के सामाजिक, भावनात्मक और नैतिक आयामों को एकीकृत करता है। भविष्य में इसका तुलनात्मक अध्ययन (बौद्ध, अम्बेडकरवादी और मार्क्सवादी दर्शन के संदर्भ में) व्यापक शोध की संभावनाएँ प्रस्तुत करता है।


संदर्भ ग्रंथ सूची (APA शैली)


Ambedkar, B. R. (1936). Annihilation of Caste.

Kabir. (15th c.). Bijak.

Marx, K. (1867). Capital.

Patel, G. (2020–2025). Selected Poems and Essays.

Phule, J. (1873). Gulamgiri.


अन्य संदर्भ (पत्र-पत्रिकाएं):-  'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित' ,'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर' ,'उदिता' ,'विश्व गाथा' , 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प' आदि।



— अरविंद पटेल (शोधार्थी पत्रकार)

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