बहुजन चेतना के प्रज्ञा-वृक्ष : गोलेन्द्र पटेल के काव्य में प्रतिरोध, करुणा और वैचारिक मुक्ति
सुप्रसिद्ध कवि और वैचारिक चिंतक गोलेन्द्र पटेल की कविताएँ और टिप्पणियाँ समकालीन हिंदी साहित्य में एक नए 'बहुजन विमर्श' की जीवंत प्रस्तावना हैं। उनकी कविताओं में बुद्ध, कबीर, रैदास और तुकाराम केवल ऐतिहासिक पात्र नहीं हैं, बल्कि वे एक ऐसी वैचारिक मशाल हैं जो वर्तमान समय के पाखंड, जातिवाद और सांप्रदायिक संकीर्णता के अंधेरे को चीरने का साहस करती हैं। गोलेन्द्र की दृष्टि में 'बुद्ध' शांति के प्रतीक होने के साथ-साथ एक 'अनुभव' हैं, जो युद्ध की विभीषिका के बीच 'त्रिपिटक' में अपनी मुक्ति खोजती उस भिक्षुणी के माध्यम से प्रकट होते हैं जिसके पात्र में पीड़ा है। कवि बड़ी बेबाकी से रेखांकित करते हैं कि "बुद्ध अब बुद्ध नहीं, ईश्वर हैं यह उनकी प्रतिमाएँ बोलती हैं", जो बुद्ध के संस्थागतकरण और उनके वास्तविक क्रांतिकारी विचारों के लोप पर एक गहरा प्रहार है। उनकी रचनाओं में पालि भाषा के प्रति एक शोधार्थी की तड़प और एक सांस्कृतिक योद्धा का आक्रोश एक साथ दिखाई देता है। 'भाषा का दर्द' कविता में वे शैक्षणिक संस्थानों की उस विद्रूपता को उजागर करते हैं जहाँ पालि को जानबूझकर हाशिये पर धकेला गया है, ताकि समाज अपनी जड़ों और बुद्ध-वचनों से न जुड़ सके। वे स्पष्ट कहते हैं कि "पालि के साथ संस्कृत भी पढ़ो तभी 'हिन्दी साहित्य में बुद्ध' विषय पर शोध कर पाओगे", यह शिक्षा तंत्र में व्याप्त उस वर्चस्ववादी मानसिकता की ओर संकेत है जो ज्ञान के लोकतंत्रीकरण को रोकती है।
कवि की बहुजन दृष्टि 'महाछठ' जैसे लोक-पर्वों का भी पुनरुद्धार करती है, जहाँ वे ठेकुआ और अगरौटा के बीच होते वैचारिक युद्ध में 'छठी माई' को महामाया और 'सूर्य' को तथागत बुद्ध के रूप में पहचानते हैं। यह लोक-संस्कृति के भीतर छिपे बौद्ध प्रतीकों की खोज करने की एक मौलिक और साहसी दृष्टि है। गोलेन्द्र की कविताएँ 'भयावह समय' का जीवंत दस्तावेज हैं, जहाँ वे उन लोगों के मुखौटे उतारते हैं जो अंबेडकर, मार्क्स या सावित्रीबाई फुले का नाम तो लेते हैं, लेकिन उनके भीतर जातिवाद, सामंतवाद और पितृसत्ता की जड़ें बहुत गहरी जमी हुई हैं। उनकी पंक्तियाँ—"कोई कबीर की झीनी चादर में, जात की गाँठें कसकर बाँधे हुए" और "कोई प्रगतिशीलता का पैरहन पहने, पर मन के कोने में सामंती जोड़े"—आज के बौद्धिक जगत के पाखंड पर सबसे करारी चोट हैं। उनके लिए पिता भी कोई सामान्य पुरुष नहीं, बल्कि 'मसि कागद छुयौ नाहिं' वाली कबीर की परंपरा के 'शब्द संवाहक श्रमिक' और 'बोधिसत्व' हैं। यहाँ कवि श्रम की गरिमा को बुद्धत्व के समांतर खड़ा करते हैं, जो बहुजन सौंदर्यशास्त्र की एक बड़ी उपलब्धि है।
गोलेन्द्र की कविताओं में 'राम' के चरित्र का विश्लेषण भी बेहद सूक्ष्म है। वे वाल्मीकि, तुलसी और निराला के राम से होते हुए आज के 'राजनीतिक राम' तक की यात्रा को जिस तरह व्यक्त करते हैं, वह सत्ता और धर्म के गठजोड़ को पूरी तरह नग्न कर देता है। वे पूछते हैं कि "क्या रविदासिया रामनामी को कबीर के राम से ख़तरा है?" और यह संकेत देते हैं कि वर्तमान दौर में राम को "बड़ा मन नहीं, बड़ा मंदिर चाहिए।" यह कविता एक निर्भीक प्रतिपक्ष की आवाज़ है। रविदास (रैदास) के प्रति उनकी श्रद्धा एक साधक की है, भक्त की नहीं। वे रविदास को 'मृत्युंजय चर्मकार' कहते हैं और उनके विचारों को "जीवन का जुआ" मानकर अपने कंधे पर ढोते हैं। गोलेन्द्र के लिए 'अप्प दीपो भव' केवल एक उपदेश नहीं, बल्कि एक मार्ग है जिस पर चलते हुए वे अल्लाह-ईश्वर से लेकर कार्ल मार्क्स और आइंस्टीन तक के केवल 'पाठक' बने रहना चाहते हैं, 'पुजारी' नहीं। उनकी यह निर्लिप्तता और तर्कशीलता ही उन्हें एक आधुनिक और प्रगतिशील बहुजन कवि के रूप में स्थापित करती है। अंततः, उनकी कविताएँ 'प्रज्ञा के उस पेड़' की तरह हैं जिसकी शाखाओं के पास सम्यक दृष्टि है और जो युद्ध की आँधियों के विरुद्ध अडिग खड़ा है। यह समूचा काव्य-संग्रह और टिप्पणियाँ समाज को आईना दिखाने के साथ-साथ एक अधिक न्यायपूर्ण और मानवीय धम्म-भूमि की तलाश का सार्थक प्रयास हैं।
बहुजन दृष्टि से युवा कवि गोलेन्द्र पटेल की कविताएँ और टिप्पणियाँ एक व्यापक वैचारिक संसार का निर्माण करती हैं, जिसमें इतिहास, भाषा, धर्म, राजनीति और मनुष्यता के प्रश्न एक साथ धड़कते हैं। यह रचनात्मक संसार केवल सौंदर्यबोध तक सीमित नहीं है, बल्कि एक सजग और संघर्षशील चेतना का विस्तार है, जो शोषण, पाखंड और वर्चस्व की संरचनाओं को पहचानती भी है और उन्हें चुनौती भी देती है। इन कविताओं में गौतम बुद्ध, कबीर, रविदास और तुकाराम की परंपरा केवल स्मरण के रूप में नहीं आती, बल्कि वह जीवित वैचारिक ऊर्जा के रूप में सक्रिय रहती है, जो कवि के अनुभव और अभिव्यक्ति को दिशा देती है। जब कवि यह कहता है—“बुद्ध, कबीर, रैदास, तुकाराम एवं पलटूदास मेरे जीवन की पञ्चवाणी हैं”—तो वह अपने बौद्धिक वंश और सांस्कृतिक आधार की घोषणा करता है, जो बहुजन परंपरा को केंद्र में स्थापित करता है और ज्ञान के ब्राह्मणवादी केंद्रीकरण को तोड़ता है। “युद्ध की तुक बुद्ध” जैसी कविता में कवि का व्यंग्य अत्यंत तीक्ष्ण और मारक है। “जब-जब युद्ध हुआ है / तब-तब याद आये हैं बुद्ध / सिर्फ तुक भर”—इन पंक्तियों में समाज की वह प्रवृत्ति उजागर होती है जिसमें बुद्ध को केवल प्रतीक या भाषिक सजावट बना दिया गया है। यह आलोचना केवल धार्मिक पाखंड की नहीं, बल्कि उस बौद्धिक आलस्य की भी है जो विचारों को जीवन में उतारने के बजाय उन्हें अवसरवादी ढंग से उपयोग करता है। इसी कविता में “बुद्ध अब बुद्ध नहीं, ईश्वर हैं”—कहकर कवि उस ऐतिहासिक प्रक्रिया की ओर संकेत करता है जिसमें एक क्रांतिकारी, तर्कशील और मानवीय व्यक्तित्व को देवत्व में बदलकर निष्क्रिय बना दिया जाता है। बहुजन दृष्टि से यह बिंदु अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सत्ता द्वारा विचारों के अपहरण की प्रक्रिया को उजागर करता है।
“भाषा का दर्द” कविता में कवि ने भाषा को जीवित सत्ता के रूप में प्रस्तुत किया है। “भाषा का भी होता है दर्द / यह मैंने पालि से जाना”—यह पंक्ति भाषा के माध्यम से ज्ञान की राजनीति को समझने का द्वार खोलती है। पालि का “आलमारी में बैठा रोना” केवल एक भाषा की उपेक्षा नहीं है, बल्कि उस समूची बहुजन ज्ञान-परंपरा का दमन है जो बुद्ध के माध्यम से विकसित हुई थी। कवि यहाँ शिक्षा-व्यवस्था की असमानता, मार्गदर्शन की कमी और ज्ञान-संसाधनों के अभाव की ओर संकेत करता है। यह कविता बहुजन विमर्श में भाषा को एक केंद्रीय प्रश्न के रूप में स्थापित करती है, जहाँ भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता और प्रतिरोध का क्षेत्र भी है। “महाछठ पर्व” में कवि लोकपर्व के भीतर छिपी ऐतिहासिक परतों को उजागर करता है—“छठ पूजा बौद्ध का महापर्व है / छठी माई हैं महामाया / और सूर्य हैं तथागत बुद्ध!”—यह कथन केवल सांस्कृतिक पुनर्पाठ नहीं, बल्कि उस इतिहास को पुनः प्राप्त करने का प्रयास है जिसे समय के साथ बदल दिया गया। इसी तरह “बुद्ध की धरती कहाँ है?” कविता में कवि का प्रश्न एक गहरे अस्तित्वगत संकट को सामने लाता है। “हम सोचने लगे कि बुद्ध की धरती कहाँ है?”—यह प्रश्न केवल भौगोलिक नहीं, बल्कि वैचारिक और सामाजिक भी है। जब कवि लिखता है—“बुद्ध को धीरे-धीरे धरती से गायब किया गया”—तो वह उस ऐतिहासिक विस्थापन को चिन्हित करता है जिसमें बहुजन नायकों को उनकी जड़ों से काटकर उन्हें दूसरे ढाँचों में समाहित कर दिया गया।
कवि की दार्शनिक घोषणाएँ भी बहुजन दृष्टि की प्रखर अभिव्यक्ति हैं। “कोई भी धर्म, कोई भी दर्शन… मेरा स्थायी पड़ाव नहीं है”—यह कथन स्वतंत्र चिंतन की घोषणा है, जो अंधानुकरण के विरुद्ध खड़ा होता है। यहाँ भीमराव अंबेडकर, ज्योतिराव फुले और कार्ल मार्क्स जैसे विचारकों का संदर्भ एक समन्वयवादी दृष्टि को सामने लाता है, जिसमें कवि सबको पढ़ता है, पर किसी का अनुयायी नहीं बनता। यह दृष्टि बहुजन चिंतन की उस परंपरा को आगे बढ़ाती है जो ज्ञान को ग्रहण करने की स्वतंत्रता पर बल देती है। “भयावह समय” कविता समकालीन समाज की सबसे सशक्त आलोचनाओं में से एक है। “कोई बुद्ध का चीवर लपेटे है, पर भीतर हिंसा का साँप पाले हुए”—यह पंक्ति प्रतीकों और वास्तविकता के बीच के अंतर को उजागर करती है। “कोई अंबेडकर का चोला पहने, पर संविधान को गिरवी रखे”—यहाँ कवि उस पाखंड को सामने लाता है जो विचारधाराओं के नाम पर फलता-फूलता है। यह कविता बहुजन दृष्टि से एक चेतावनी है कि केवल प्रतीकात्मकता से परिवर्तन संभव नहीं, बल्कि आंतरिक ईमानदारी और प्रतिबद्धता आवश्यक है।
“पिता शब्द संवाहक श्रमिक हैं” कविता में कवि ने श्रम और ज्ञान के संबंध को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत किया है। “वे शब्द संवाहक श्रमिक हैं”—यह पंक्ति श्रमिक जीवन की गरिमा को स्थापित करती है। पिता का “बोधिसत्व” होना और “सर्वश्रेष्ठ शिक्षक” होना यह दर्शाता है कि ज्ञान केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि जीवन के अनुभव में भी निहित है। यह बहुजन दृष्टि का मूल तत्व है, जिसमें श्रम और अनुभव को ज्ञान के बराबर महत्व दिया जाता है। “तीन जातियाँ” कविता सामाजिक यथार्थ की गहरी पड़ताल करती है। “वे भाषा में प्रगतिशील होती हैं लेकिन भाव में नहीं”—यह पंक्ति आज के प्रगतिशील समाज की सीमाओं को उजागर करती है। कवि यह दिखाता है कि जातिवाद केवल बाहरी संरचना नहीं, बल्कि भीतर की मानसिकता भी है, जो अवसर मिलने पर अपना वास्तविक रूप प्रकट कर देती है। इसी तरह “राम भिक्षाटन पर हैं” कविता धार्मिक और राजनीतिक विमर्श के अंतर्संबंधों को उजागर करती है—“राम—जुआरियों के हाथों में हुक्म के इक्के हैं”—यह पंक्ति धर्म के राजनीतिक उपयोग पर तीखा व्यंग्य है।
अन्य कविताओं में भी कवि की समन्वयवादी और आलोचनात्मक दृष्टि स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। “रैदास की कठौती और कबीर के करघे के बीच / तुलसी का दुख एक सेतु की तरह है”—यहाँ परंपराओं के बीच संवाद की संभावना दिखाई देती है। “बुद्ध कोई देवता नहीं हैं / फिर भी वे हमारी आस्था की एकमात्र शरणस्थली हैं”—यह पंक्ति आस्था और तर्क के संतुलन को व्यक्त करती है। “मैं तुम्हारा भक्त नहीं, साधक हूँ”—यहाँ भक्ति से अधिक साधना और विचार को महत्व दिया गया है। “जिसके तने तर्क करना सिखाते हैं / और पत्तियाँ प्रतीत्यसमुत्पाद की बातें”—इस अंतिम कविता में बुद्ध को एक जीवित ज्ञान-वृक्ष के रूप में प्रस्तुत किया गया है, जो निरंतर विकसित होता है और मनुष्य को सोचने, समझने और बदलने की प्रेरणा देता है। समग्र रूप से देखा जाए तो इन कविताओं में बहुजन चेतना की गहराई, वैचारिक साहस, भाषिक संवेदनशीलता और मानवीय करुणा का अद्भुत संगम है। यह काव्य केवल प्रतिरोध का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक नए समाज की कल्पना भी है, जहाँ समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व केवल आदर्श नहीं, बल्कि जीवन के आधार बनते हैं। गोलेन्द्र पटेल का यह काव्य-संसार हमें न केवल सोचने के लिए बाध्य करता है, बल्कि हमें यह भी सिखाता है कि सच्ची मनुष्यता किस प्रकार निर्मित होती है और उसे बचाए रखने के लिए किस प्रकार की वैचारिक प्रतिबद्धता आवश्यक है।



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