Friday, September 4, 2026

गोलेन्द्र पटेल : मुख्यधारा के युवा स्वर

 *गोलेन्द्र पटेल : मुख्यधारा के युवा स्वर

समकालीन हिंदी साहित्य का परिदृश्य अनेक वैचारिक धाराओं, जीवनानुभवों और सौंदर्य-दृष्टियों के अंतर्संबंध से निर्मित होता है। इस परिदृश्य में नई पीढ़ी के कुछ रचनाकार ऐसे हैं जो कविता को केवल निजी अनुभूति का माध्यम न मानकर सामाजिक जीवन की जटिलताओं से मुठभेड़ का उपकरण बनाते हैं। गोलेन्द्र पटेल इसी पीढ़ी के एक युवा कवि-लेखक, साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक के रूप में अपनी रचनात्मक पहचान निर्मित कर रहे हैं। उनकी कविताएँ समकालीन जीवन के उन दृश्यों को सामने लाती हैं जहाँ खेत और कारखाना, भूख और रोटी, श्रम और शोषण, जाति और मनुष्यता, स्त्री और असमानता, गाँव और सत्ता, उम्मीद और निराशा एक-दूसरे से टकराते हुए दिखाई देते हैं। कविता कोश में उनके जन्म-वर्ष और जन्मस्थान के साथ उनकी अनेक प्रतिनिधि कविताएँ—‘मुसहरिन माँ’, ‘श्रम का स्वाद’, ‘थ्रेसर’, ‘लकड़हारिन’, ‘उम्मीद की उपज’ आदि—दर्ज हैं; इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उनका काव्य-संसार आरंभ से ही श्रम, किसान और वंचित जीवन की ओर उन्मुख रहा है। गोलेन्द्र पटेल का जन्म 5 अगस्त 1999 को उत्तर प्रदेश के चंदौली जनपद के खजूरगाँव, साहुपुरी में होता है। ग्रामीण कृषक परिवेश से आने के कारण उनके अनुभव-संसार में गाँव केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि जीवन की पहली पाठशाला के रूप में उपस्थित होता है। माता श्रीमती उत्तम देवी और पिता श्री नन्दलाल से प्राप्त जीवन-संस्कार, ग्रामीण समाज की संरचना, श्रमशील समुदायों का जीवन, खेत-खलिहान का परिवेश और अभावों के बीच मनुष्य की जिजीविषा उनकी संवेदना को आधार प्रदान करते हैं। आगे चलकर काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी का अध्ययन उनके अनुभव को व्यापक साहित्यिक और वैचारिक संदर्भ देता है। उनकी शिक्षा में हिंदी के साथ संस्कृत और अध्यापन का प्रशिक्षण भी शामिल होता है। इस तरह लोकजीवन और अकादमिक अध्ययन, अनुभव और विचार, मिट्टी और पुस्तक—इन दोनों संसारों के बीच उनका रचनात्मक व्यक्तित्व आकार ग्रहण करता है। गोलेन्द्र पटेल की साहित्यिक उपस्थिति का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष उनकी जनपक्षधरता है। जनपक्षधरता उनके यहाँ किसी राजनीतिक नारे की पुनरावृत्ति मात्र नहीं है; यह मनुष्य के जीवन की वास्तविक परिस्थितियों को देखने की एक नैतिक और साहित्यिक दृष्टि है। वे उन लोगों को कविता का केंद्र बनाते हैं जिनका श्रम समाज की अर्थव्यवस्था और सभ्यता को चलाता है, लेकिन जिनकी आवाज सत्ता और प्रतिष्ठा के गलियारों में अक्सर कमजोर पड़ जाती है। किसान, खेतिहर मजदूर, निर्माण मजदूर, गरीब परिवार, दलित समुदाय, स्त्री और श्रमजीवी मनुष्य उनकी कविता में सहानुभूति के पात्र भर नहीं हैं; वे अपनी पीड़ा, संघर्ष और आत्मसम्मान के साथ उपस्थित होते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता में ‘श्रम’ एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक मूल्य बनकर उभरता है। उनकी कविता ‘थ्रेसर’ में कृषि-आधारित जीवन की आधुनिक तकनीक और श्रमिक की असुरक्षा के बीच पैदा होने वाली त्रासदी को देखा जा सकता है। ‘गुढ़ी’ में खेत, कटाई और रोटी के प्रश्न के माध्यम से श्रम और अधिकार का संबंध सामने आता है। ‘ऊख’ में कृषि-श्रम और लोकतांत्रिक सत्ता के अंतर्विरोध को तीखे रूपक में व्यक्त किया जाता है। ‘उम्मीद की उपज’ में किसान-जीवन को केवल अभाव की कथा न बनाकर उम्मीद की खेती से जोड़ा जाता है। इन रचनाओं के प्रकाशित रूपों से यह प्रमाणित होता है कि गोलेन्द्र की कविता का किसान केवल दयनीय पात्र नहीं है; वह उत्पादक, संघर्षशील और प्रश्न करने वाला मनुष्य है। उनकी कविता का एक बड़ा गुण यह है कि वह सामाजिक यथार्थ को अमूर्त शब्दावली में नहीं, बल्कि जीवन के ठोस बिंबों में पकड़ती है। खेत, ऊख, थ्रेसर, रोटी, चोकर, ईंट, गारा, माँ, पसीना, हथौड़ा, धूल, धुआँ और भूख जैसे शब्द उनकी काव्य-भाषा में प्रतीक बनकर आते हैं। यही कारण है कि उनकी कविता को पढ़ते हुए पाठक किसी दूरस्थ वैचारिक व्याख्यान में नहीं, बल्कि जीवन के बीच खड़ा हुआ महसूस करता है। उनकी भाषा का सौंदर्य उसकी सहजता और सामाजिक अर्थवत्ता में है। वे कठिन शब्दों के प्रदर्शन से कविता की शक्ति नहीं बनाते; साधारण जीवन के शब्दों में असाधारण अर्थ की संभावना तलाशते हैं। ‘मेरा दुःख मेरा दीपक है’ जैसी रचना उनके काव्य-दर्शन को समझने की एक महत्त्वपूर्ण कुंजी प्रदान करती है। इस कविता में माँ का श्रम, मजदूर परिवार का जीवन और पीढ़ियों से चले आ रहे अभाव एक निजी स्मृति से उठकर सामाजिक अनुभव में बदल जाते हैं। यहाँ दुःख केवल रोने का कारण नहीं है; वह देखने की रोशनी है। यही उनकी कविता की उल्लेखनीय विशेषता है कि वह पीड़ा को निष्क्रिय भावुकता में बदलने के बजाय चेतना का स्रोत बनाती है। प्रकाशित पाठ में माँ का श्रम और उसके माध्यम से श्रम-संस्कृति की स्मृति जिस तरह सामने आती है, उससे स्पष्ट होता है कि कवि के लिए व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक यथार्थ अलग-अलग संसार नहीं हैं। गोलेन्द्र पटेल की रचना-दृष्टि में दलित और बहुजन जीवन का प्रश्न इसी व्यापक सामाजिक यथार्थ के भीतर आता है। वे सामाजिक असमानता को केवल आर्थिक समस्या के रूप में नहीं देखते; उसके भीतर जाति, सामाजिक प्रतिष्ठा, सांस्कृतिक वर्चस्व और संसाधनों के असमान वितरण की परतों को भी पहचानते हैं। ‘चोकर की लिट्टी’ जैसी कविता में भोजन का साधारण-सा बिंब सामाजिक पदानुक्रम का गहरा प्रतीक बन जाता है। रोटी की गुणवत्ता यहाँ केवल गरीबी का संकेत नहीं रहती; वह इस प्रश्न को जन्म देती है कि समाज में किसके हिस्से में सम्मानजनक जीवन आता है और किसके हिस्से में अभाव। इस तरह भोजन, जाति और गरिमा का संबंध कविता में एक साथ उपस्थित होता है। उनकी जनपक्षधरता का अर्थ किसी एक जाति या समुदाय की सीमित प्रतिनिधि आवाज बन जाना नहीं है। उनकी रचनात्मक दृष्टि वंचना के विविध रूपों को एक-दूसरे से जोड़ती है। दलित, आदिवासी, पिछड़े, श्रमिक, किसान, स्त्री, गरीब और अन्य सामाजिक रूप से वंचित समूह उनके व्यापक मानवीय सरोकार के हिस्से बनते हैं। इस दृष्टि का मूल आधार संख्या नहीं, बल्कि मनुष्य की गरिमा है। बहुजन चेतना उनके लिए सामाजिक न्याय की उस व्यापक आकांक्षा का नाम बनती है जिसमें इतिहास में उपेक्षित समुदाय अपने श्रम, ज्ञान और सांस्कृतिक योगदान के साथ दिखाई दें। गोलेन्द्र पटेल के साहित्य में जाति-विरोधी चेतना इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि वह मनुष्य की बराबरी के प्रश्न से जुड़ती है। उनके यहाँ सामाजिक रूढ़ि का विरोध केवल असहमति व्यक्त करने के लिए नहीं है; उसके पीछे मनुष्य को जन्मगत श्रेणियों में बाँटने वाली मानसिकता से मुक्ति की आकांक्षा है। यह आकांक्षा उन्हें संत परंपरा, बौद्ध चिंतन और आधुनिक सामाजिक न्याय की विचारधाराओं से संवाद करने की प्रेरणा देती है। बुद्ध की करुणा, कबीर की निर्भीक प्रश्नाकुलता, रविदास की समतामूलक कल्पना, फुले की सत्यशोधक चेतना, शाहू महाराज की सामाजिक न्याय-दृष्टि और आंबेडकर के लोकतांत्रिक-समानतावादी विचार उनके वैचारिक संसार में अलग-अलग स्रोतों की तरह दिखाई देते हैं। इस वैचारिक पृष्ठभूमि की एक विशेषता यह है कि गोलेन्द्र पटेल अतीत के महापुरुषों को केवल श्रद्धा के विषय के रूप में नहीं, बल्कि विचार के स्रोत के रूप में ग्रहण करते हैं। उनके लिए किसी महापुरुष की प्रासंगिकता उसके अनुयायियों की संख्या में नहीं, बल्कि उसके विचार की वर्तमान उपयोगिता में निहित होती है। यही दृष्टि उन्हें स्मृति और समकालीनता के बीच संवाद स्थापित करने में सहायता करती है। वे परंपरा को जड़ वस्तु नहीं मानते; उसे वर्तमान के प्रश्नों से जाँचते हैं। उनकी कविता में बुद्ध का संदर्भ इसी कारण विशेष अर्थ ग्रहण करता है। बुद्ध उनके लिए केवल आध्यात्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि करुणा, विवेक, नैतिकता और मनुष्य-केंद्रित चिंतन के प्रतिनिधि हैं। इसी प्रकार कबीर उनके लिए केवल भक्तिकाल के कवि नहीं, बल्कि प्रश्न करने और रूढ़ियों को चुनौती देने वाली चेतना के प्रतीक हैं। आंबेडकर सामाजिक समानता और संवैधानिक लोकतंत्र के नैतिक आधार के रूप में सामने आते हैं। इस प्रकार गोलेन्द्र की वैचारिकता कई परंपराओं के रचनात्मक संवाद से बनती है। उनकी कविता में स्त्री की उपस्थिति भी इसी व्यापक सामाजिक न्याय-बोध का विस्तार है। ‘मुसहरिन माँ’ जैसी रचना में स्त्री का जीवन केवल मातृत्व के भावुक चित्रण तक सीमित नहीं रहता। श्रम, गरीबी, जातिगत वंचना और स्त्री होने की सामाजिक स्थितियाँ एक-दूसरे में गुंथी हुई दिखाई देती हैं। ऐसी कविता पाठक को यह सोचने के लिए बाध्य करती है कि समाज में श्रम करने वाली स्त्री की पहचान, उसकी गरिमा और उसके अधिकार को किस तरह देखा जाता है। उनकी स्त्री-संवेदना का महत्त्व इसी बात में है कि वह स्त्री को केवल करुणा की वस्तु न बनाकर संघर्षरत मनुष्य के रूप में देखने की कोशिश करती है।


गोलेन्द्र पटेल की कविता का प्रतिरोधी स्वर भी उल्लेखनीय है। सत्ता, वर्चस्व और सामाजिक अन्याय के प्रति उनका असंतोष स्पष्ट है, लेकिन उनकी कविता केवल उत्तेजना पर निर्भर नहीं रहती। उसके भीतर प्रश्न, तर्क और संवाद की आकांक्षा भी दिखाई देती है। यही बात उन्हें महज घोषणापरक कविता से अलग करती है। वे पाठक को आदेश नहीं देते; उसे अपने आसपास की दुनिया को नए ढंग से देखने के लिए विवश करते हैं। उनकी कविता की राजनीतिकता इसी अर्थ में साहित्यिक बनती है—वह सीधे राजनीतिक भाषण में बदलने के बजाय जीवन के अनुभवों से प्रश्न पैदा करती है। ‘ऊख’ जैसी कविता इसका उदाहरण प्रस्तुत करती है। गन्ने और पेरने की प्रक्रिया का रूपक लोकतंत्र, श्रम और सत्ता के संबंधों को एक साथ पकड़ता है। ‘गुढ़ी’ में खेत और रोटी के प्रश्न से सत्ता और श्रम के बीच दूरी दिखाई देती है। ‘थ्रेसर’ में कृषि-आधुनिकता के भीतर छिपी श्रमिक असुरक्षा सामने आती है। इन रचनाओं में राजनीतिक चेतना किसी बाहरी विचार को कविता पर आरोपित नहीं करती; वह जीवन की परिस्थितियों से पैदा होती है। उनके साहित्य में ‘रोटी’ एक बार-बार लौटने वाला महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक बिंब है। रोटी भूख का समाधान भर नहीं है; वह श्रम, अधिकार, सम्मान और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण का प्रतीक बन जाती है। जिस समाज में रोटी पैदा करने वाला ही भूखा रह जाए, वहाँ कविता का प्रश्न स्वाभाविक रूप से राजनीतिक और नैतिक प्रश्न बन जाता है। गोलेन्द्र पटेल इसी विडंबना को अपने काव्य में पकड़ते हैं। उनकी कविता में ग्रामीण जीवन के प्रति एक गहरी आत्मीयता है, लेकिन यह आत्मीयता ग्रामीण जीवन का रोमानीकरण नहीं करती। खेत सुंदर भी है और संघर्ष का स्थल भी। किसान प्रकृति के निकट भी है और बाजार तथा सत्ता के दबाव में भी। गाँव स्मृति का संसार भी है और सामाजिक विषमता का भूगोल भी। इस द्वंद्व को समझना उनकी कविता को समझने के लिए आवश्यक है। वे गाँव को किसी काल्पनिक स्वर्णयुग के रूप में नहीं देखते; वे उसके भीतर मौजूद श्रम, गरीबी, जातिगत संबंधों, उम्मीद और संघर्ष की वास्तविकता को सामने लाते हैं। युवा कवि के रूप में उनकी एक उल्लेखनीय विशेषता यह भी है कि वे पारंपरिक काव्य-सौंदर्य की सीमाओं को विस्तृत करने का प्रयास करते हैं। उनके यहाँ सौंदर्य केवल फूल, चाँद, नदी और प्रेम के पारंपरिक बिंबों से निर्मित नहीं होता। फटी हथेली, खेत की मिट्टी, मजदूर का पसीना, माँ का श्रम, चोकर की लिट्टी और किसान की उम्मीद भी उनके लिए सौंदर्य के विषय हैं। इस दृष्टि से उनका काव्य-सौंदर्य जीवन की उन वस्तुओं को साहित्यिक गरिमा देता है जिन्हें अभिजात सौंदर्यशास्त्र लंबे समय तक उपेक्षित करता रहा है। उनकी भाषा में लोक और आधुनिकता का एक रोचक मेल दिखाई देता है। भोजपुरी भाषिक परिवेश से प्राप्त शब्द-संवेदना हिंदी की व्यापक अभिव्यक्ति में प्रवेश करती है। इससे उनकी कविता में स्थानीयता का स्वाद आता है, लेकिन वह स्थानीयता संकीर्ण नहीं होती। चंदौली की मिट्टी से उठी संवेदना व्यापक भारतीय समाज के प्रश्नों से जुड़ती है। यही स्थानीय से वैश्विक और निजी से सार्वभौमिक की ओर बढ़ने की साहित्यिक प्रक्रिया है। गोलेन्द्र पटेल की रचनात्मक सक्रियता कविता तक सीमित नहीं है। कहानी, निबंध, नाटक, उपन्यास और आलोचना जैसी विधाओं में उनकी रुचि यह संकेत देती है कि वे साहित्य को एक बहुविध बौद्धिक कर्म के रूप में देखते हैं। उनकी आलोचनात्मक दृष्टि कविता के भीतर मौजूद सामाजिक संरचनाओं को समझने की कोशिश करती है, जबकि कविता अनुभव को संवेदना और भाषा में बदलती है। यह द्वंद्व उनके साहित्यिक व्यक्तित्व को केवल कवि की सीमा से आगे ले जाकर साहित्यिक चिंतक की दिशा में विकसित करता है। इसी क्रम में उनका सांस्कृतिक चिंतन भी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। संस्कृति उनके लिए केवल परंपराओं और उत्सवों का संग्रह नहीं है। संस्कृति में भाषा, श्रम, स्मृति, लोकजीवन, इतिहास, ज्ञान और सामाजिक संबंध सभी शामिल होते हैं। इसलिए किसी समुदाय के सांस्कृतिक योगदान को पहचानना उसके अस्तित्व और सम्मान को पहचानना भी है। बहुजन इतिहास और श्रम-संस्कृति की पुनर्पहचान की उनकी चिंता इसी सांस्कृतिक दृष्टि का परिणाम है।


गोलेन्द्र पटेल को अंतरराष्ट्रीय काशी घाटवॉक विश्वविद्यालय की ओर से "प्रथम सुब्रह्मण्यम भारती युवा कविता सम्मान - 2021" , "रविशंकर उपाध्याय स्मृति युवा कविता पुरस्कार-2022", हिंदी विभाग, काशी हिंदू विश्वविद्यालय की ओर से "शंकर दयाल सिंह प्रतिभा सम्मान-2023",  "मानस काव्य श्री सम्मान 2023", "शब्द शिल्पी सम्मान 2025", "महावीरप्रसाद ‘विद्यार्थी’ स्मृति शब्द संधान सम्मान 2025", "साहित्य का सार्थवाह सम्मान 2025" एवं अनेकानेक साहित्यिक संस्थाओं से प्रेरणा प्रशस्तिपत्र प्राप्त हुए हैं। उनकी साहित्यिक यात्रा को प्राप्त सम्मान और विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं से भी उनके सक्रिय रचनात्मक जीवन का अनुमान लगाया जा सकता है। कविता कोश पर उनका स्वतंत्र रचनाकार-पृष्ठ और वहाँ दर्ज प्रतिनिधि रचनाएँ उनके काव्य-प्रसार का एक सार्वजनिक प्रमाण प्रस्तुत करती हैं।  उनकी रचनाएँ   'प्राची', 'बहुमत', 'आजकल', 'व्यंग्य कथा', 'साखी', 'वागर्थ', 'काव्य प्रहर', 'प्रेरणा अंशु', 'नव निकष', 'सद्भावना', 'जनसंदेश टाइम्स', 'विजय दर्पण टाइम्स', 'रणभेरी', 'पदचिह्न', 'अग्निधर्मा', 'नेशनल एक्सप्रेस', 'अमर उजाला', 'पुरवाई', 'सुवासित', 'गौरवशाली भारत' ,'सत्राची' ,'रेवान्त' ,'साहित्य बीकानेर', 'उदिता', 'विश्व गाथा', 'कविता-कानन उ.प्र.' , 'रचनावली', 'जन-आकांक्षा', 'समकालीन त्रिवेणी', 'पाखी', 'सबलोग', 'रचना उत्सव', 'आईडियासिटी', 'नव किरण', 'मानस',  'विश्वरंग संवाद', 'पूर्वांगन', 'हिंदी कौस्तुभ', 'गाथांतर', 'कथाक्रम', 'कथारंग', 'देशज', 'पक्षधर', 'परिकथा', 'ककसाड़', 'समय की साखी', 'आर्यकल्प', 'ज्ञानगृह', 'अंग भारत', 'विश्व केसरी', 'जनमोर्चा', 'करेंट एजेंडा', 'आदिवासीधारा', 'अर्जक संघ', 'मुस्कान एक एहसास', 'एक और अंतरीप', 'निर्माण पत्रिका' इत्यादि में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं, जो युवा कवि के रूप में उनकी रचनात्मक उपस्थिति की ओर संकेत करता है। गोलेन्द्र पटेल को 'गोलेंद्र ज्ञान', 'गोलेन्द्र पेरियार', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'ऋषि कवि',  'कोरोजयी कवि', 'आलोचना के कवि', 'महास्थविर', 'अद्यतन कबीर', 'शब्द सुश्रुत' एवं 'दिव्यांगसेवी' जैसे अनेक विशेषणों से संबोधित किया गया है। इन विशेषणों को उनके रचनात्मक व्यक्तित्व के अलग-अलग पहलुओं को रेखांकित करने वाले संकेतों के रूप में देखा जा सकता है, किंतु किसी भी रचनाकार की स्थायी पहचान अंततः उसकी रचना से ही निर्मित होती है। गोलेन्द्र पटेल की वास्तविक पहचान उनकी कविता में मौजूद श्रम-संवेदना, सामाजिक प्रश्नाकुलता, जाति-विरोधी चेतना, मानवीय करुणा और परिवर्तन की आकांक्षा से बनती है। ‘मुख्यधारा का युवा कवि-लेखक’ कहना भी उनके संदर्भ में एक विशेष अर्थ रखता है। मुख्यधारा का अर्थ यदि केवल स्थापित साहित्यिक प्रतिष्ठान की स्वीकृति से लिया जाए तो यह संज्ञा अपर्याप्त होगी। किंतु यदि मुख्यधारा का अर्थ अपने समय के केंद्रीय मानवीय प्रश्नों से संवाद करने वाली साहित्यिक धारा है, तो गोलेन्द्र पटेल की रचनात्मकता इस अवधारणा को अधिक लोकतांत्रिक अर्थ देती है। वे हाशिए के अनुभवों को साहित्य के केंद्र में लाने का प्रयत्न करते हैं। उनकी दृष्टि में मुख्यधारा वह नहीं है जो पहले से केंद्र में बैठी है; मुख्यधारा वह भी हो सकती है जो केंद्र की परिभाषा को ही विस्तृत कर दे। उनकी कविता का एक महत्त्वपूर्ण नैतिक आग्रह मनुष्य को उसकी जाति, पेशे, आर्थिक स्थिति या सामाजिक पहचान से पहले मनुष्य के रूप में देखने का है। यही आग्रह उनकी जनपक्षधरता को मानवीयता से जोड़ता है। यदि केवल प्रतिरोध हो और करुणा न हो तो कविता कठोर घोषणापत्र बन सकती है; यदि केवल करुणा हो और प्रतिरोध न हो तो वह निष्क्रिय सहानुभूति में बदल सकती है। गोलेन्द्र पटेल की कविता इन दोनों के बीच एक संतुलन खोजती है। उसमें आँसू हैं, लेकिन आँसू के साथ आग भी है; उसमें आक्रोश है, लेकिन आक्रोश के भीतर मनुष्यता भी है; उसमें निराशा है, लेकिन निराशा के भीतर उम्मीद की तलाश भी है। यही कारण है कि उनके यहाँ दुःख का अंतिम अर्थ पराजय नहीं है। दुःख अनुभव को गहरा करता है, अनुभव चेतना को जन्म देता है और चेतना परिवर्तन की आकांक्षा को। ‘मेरा दुःख मेरा दीपक है’ शीर्षक इसी काव्य-दृष्टि का अत्यंत सार्थक रूपक है। प्रकाशित पाठ में मजदूर जीवन और माँ के श्रम को जिस तरह उम्मीद और मानवीय गरिमा से जोड़ा गया है, वह उनकी कविता के मूल स्वभाव को समझने में विशेष सहायता करता है। एक युवा कवि के रूप में गोलेन्द्र पटेल के सामने अभी लंबी रचनात्मक यात्रा है। उनके साहित्य का अंतिम मूल्यांकन भविष्य का आलोचक करेगा। किसी भी रचनाकार की स्थायी प्रतिष्ठा समय, पुनर्पाठ और रचनाओं की दीर्घजीविता से तय होती है। किंतु उनकी वर्तमान रचनात्मक सक्रियता यह बताती है कि उन्होंने अपने लिए ऐसे प्रश्न चुने हैं जिनसे समकालीन भारतीय समाज लगातार जूझ रहा है। जाति, गरीबी, श्रम, किसान, स्त्री, सामाजिक न्याय, लोकतंत्र, सांस्कृतिक स्मृति और मनुष्यता के प्रश्न आने वाले समय में भी प्रासंगिक रहेंगे और इन प्रश्नों के साथ उनका रचनात्मक संवाद उनकी साहित्यिक यात्रा का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार बन सकता है। गोलेन्द्र पटेल को इसलिए केवल युवा कवि कहना उनके व्यक्तित्व को छोटा करना होगा। वे कविता के साथ साहित्यिक और सांस्कृतिक चिंतन की ओर बढ़ते हुए ऐसे रचनाकार हैं जिनकी दृष्टि अपने समय के सामाजिक अंतर्विरोधों को समझने का प्रयत्न करती है। उनकी रचनाओं में गाँव की मिट्टी से लेकर लोकतंत्र के प्रश्न तक, माँ के श्रम से लेकर बहुजन इतिहास तक, भूख से लेकर मनुष्य की गरिमा तक एक विस्तृत जीवन-संसार उपस्थित होता है। उनकी कविता साहित्य को जीवन से जोड़ती है और जीवन को प्रश्न में बदलती है। उनकी रचनात्मकता का सबसे बड़ा मूल्य शायद यही है कि वे साहित्य को मनुष्य से अलग नहीं करते। उनके लिए कविता का सौंदर्य मनुष्य की पीड़ा को देखने में है, उसकी गरिमा को पहचानने में है और उसके बेहतर भविष्य की कल्पना करने में है। वे उन आवाजों को शब्द देना चाहते हैं जिन्हें इतिहास, सत्ता और सामाजिक प्रतिष्ठा ने लंबे समय तक दबाए रखा है। लेकिन उनकी आकांक्षा केवल आवाज देने तक सीमित नहीं रहती; वे ऐसी सामाजिक चेतना की तलाश करते हैं जिसमें किसी मनुष्य को अपनी मनुष्यता सिद्ध करने के लिए जन्म, जाति, धर्म, गरीबी या पेशे की दीवारों से लड़ना न पड़े। इस दृष्टि से गोलेन्द्र पटेल समकालीन हिंदी कविता में उस युवा रचनात्मक ऊर्जा के प्रतिनिधि हैं जो अनुभव से विचार की ओर, विचार से प्रतिरोध की ओर और प्रतिरोध से मानवीय मुक्ति की ओर बढ़ना चाहती है। उनकी कविता खेत की मेड़ से निकलकर समाज के बड़े प्रश्नों तक जाती है; मजदूर की हथेली से उठकर इतिहास की किताब को छूती है; माँ के आँसू से गुजरकर मनुष्य की गरिमा का प्रश्न बनती है और रोटी के छोटे-से बिंब में पूरे सामाजिक न्याय की आकांक्षा को समेट लेती है। गोलेन्द्र पटेल की पहचान किसी एक विशेषण में संभव नहीं है। वे जनकवि हैं क्योंकि उनका सरोकार जनजीवन से है; युवा कवि हैं क्योंकि उनकी रचनात्मक ऊर्जा अपने समय की नई बेचैनियों को अभिव्यक्ति देती है; साहित्यिक चिंतक हैं क्योंकि वे साहित्य को व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भों में देखते हैं; और सांस्कृतिक चिंतक हैं क्योंकि उनके लिए मनुष्य की स्मृति, श्रम, भाषा और सम्मान संस्कृति के अनिवार्य तत्व हैं। उनकी कविता में जो सबसे अधिक मूल्यवान है, वह है मनुष्य के पक्ष में खड़े होने की निरंतर आकांक्षा। इसलिए गोलेन्द्र पटेल की साहित्यिक यात्रा को केवल उपलब्धियों की सूची के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐसे रचनात्मक प्रयत्न के रूप में पढ़ा जाना चाहिए जो अपने समय के अँधेरे में मनुष्य की गरिमा की रोशनी तलाशता है। उनकी कविता कहती हुई प्रतीत होती है कि साहित्य का अंतिम पक्ष मनुष्य है—उसकी भूख, उसका श्रम, उसका दुःख, उसका स्वप्न, उसका आत्मसम्मान और उसकी मुक्ति। यही पक्षधरता उनके कवि-व्यक्तित्व को समकालीन हिंदी साहित्य में अर्थवान बनाती है और यही उनकी आगामी रचनात्मक यात्रा के लिए सबसे बड़ी संभावना भी है।



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