गोलेन्द्रवाद : अर्थ, उत्पत्ति, परिभाषा और गोलेन्द्रवादी दर्शन
प्रस्तावना:
भारतीय बौद्धिक परंपरा में जब-जब मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता और समानता पर संकट आया है, तब-तब नए विचार, नए दर्शन और नए जीवन-मूल्य जन्म लेते रहे हैं। बुद्ध से लेकर कबीर, रैदास, फुले, अंबेडकर और मार्क्स तक की परंपरा इसी संघर्षशील मानवीय चेतना की परंपरा है। इक्कीसवीं सदी के भारतीय और वैश्विक संदर्भ में इसी परंपरा का समकालीन, समन्वयात्मक और वैज्ञानिक विस्तार है—गोलेन्द्रवाद (Golendrism)।
गोलेन्द्रवाद न तो केवल एक राजनीतिक विचारधारा है, न कोई संप्रदाय, न कोई धार्मिक मत। यह मूलतः मानवीय जीवन जीने की पद्धति है, जो जाति, धर्म, भाषा और भूगोल से निरपेक्ष होकर समय-सापेक्ष वैज्ञानिक विवेक और मानवतावाद को केंद्र में रखती है।
1. गोलेन्द्रवाद का अर्थ:
‘गोलेन्द्रवाद’ शब्द दो स्तरों पर अर्थ ग्रहण करता है—नामार्थ और विचारार्थ।
‘गोलेन्द्र’ का अर्थ है—ज्ञान का अधिपति, लोकचेतना का नेतृत्वकर्ता, प्रकाश का स्वामी। यह नाम स्वयं में बोधिसत्वीय संकल्प, लोकपक्षधर चेतना और संघर्षशील विवेक का प्रतीक है। इसी नाम से विकसित विचार-पद्धति गोलेन्द्रवाद कहलाती है।
इस अर्थ में गोलेन्द्रवाद वह दर्शन है, जिसमें:
मनुष्य केंद्र में है,
ज्ञान का स्रोत तर्क और अनुभव है,
और जीवन का लक्ष्य मानवीय गरिमा की स्थापना है।
गोलेन्द्रवाद किसी एक सत्य या अंतिम सिद्धांत का दावा नहीं करता, बल्कि सत्य को एक सतत खोज की प्रक्रिया मानता है।
2. गोलेन्द्रवाद की उत्पत्ति:
गोलेन्द्रवाद की उत्पत्ति किसी एक क्षण या घटना से नहीं, बल्कि एक दीर्घ ऐतिहासिक और वैचारिक प्रक्रिया से हुई है। इसकी जड़ें भारतीय श्रमण परंपरा, बौद्ध करुणा-दर्शन, संत परंपरा, सामाजिक न्याय आंदोलनों और आधुनिक वैज्ञानिक चेतना में निहित हैं।
बुद्ध की करुणा, कबीर की निर्भीक निर्गुण चेतना, रैदास की समतामूलक समाज-दृष्टि, तुकोबा की लोकभक्ति, फुले की क्रांतिकारी सामाजिक चेतना, अंबेडकर का संविधानवादी मानवतावाद, पेरियार का तर्कवाद, मार्क्स का वर्ग-संघर्ष सिद्धांत, राहुल सांकृत्यायन का घुमक्कड़ विवेक और ओशो की चेतना-स्वतंत्रता—इन सभी का मानवीय सार गोलेन्द्रवाद की वैचारिक भूमि तैयार करता है।
इस प्रकार गोलेन्द्रवाद किसी एक ‘वाद’ की नकल नहीं, बल्कि अनेक मानवीय परंपराओं का समन्वयात्मक विकास है।
3. गोलेन्द्रवाद की परिभाषा:
गोलेन्द्रवाद की मानक परिभाषा इस प्रकार दी जा सकती है:
> “गोलेन्द्रवाद (Golendrism) मानवीय जीवन जीने की पद्धति है, जो जाति, धर्म, भाषा और भूगोल से निरपेक्ष होकर समय-सापेक्ष वैज्ञानिक विवेक के साथ मानवतावाद को अपना केंद्रीय मूल्य बनाती है।”
इस परिभाषा के चार प्रमुख तत्व हैं—
1. जीवन-पद्धति होना
2. निरपेक्षता (जाति, धर्म, भाषा, भूगोल से परे)
3. वैज्ञानिक विवेक
4. मानवतावाद
यह दर्शन मनुष्य को साधन नहीं, साध्य मानता है।
4. गोलेन्द्रवादी दर्शन की दार्शनिक नींव:
(क) अस्तित्व का दृष्टिकोण:
गोलेन्द्रवाद के अनुसार मनुष्य एक जैविक, सामाजिक और चेतन प्राणी है। उसका अस्तित्व ईश्वरकेंद्रित नहीं, बल्कि श्रम, संबंध और चेतना से निर्मित है।
(ख) ज्ञानमीमांसा:
ज्ञान का स्रोत अनुभव, तर्क, वैज्ञानिक अनुसंधान और ऐतिहासिक चेतना है। अंधविश्वास, कर्मकांड और अप्रमाणित विश्वासों का इसमें कोई स्थान नहीं।
(ग) मूल्यशास्त्र:
मानवीय गरिमा, स्वतंत्रता, समानता और करुणा—ये गोलेन्द्रवाद के सर्वोच्च मूल्य हैं।
(घ) नीतिशास्त्र:
नैतिकता धर्मग्रंथों से नहीं, बल्कि सामाजिक सह-अस्तित्व, न्याय और वैज्ञानिक विवेक से निर्धारित होती है।
5. गोलेन्द्रवाद के आदर्श पुरुष और वैचारिक प्रतीक:
गोलेन्द्रवाद के मेनिफेस्टो के आदर्श पुरुष हैं— बुद्ध, कबीर, रैदास, तुकोबा, फुले, अंबेडकर, पेरियार, कार्ल मार्क्स, ओशो और महापंडित राहुल सांकृत्यायन।
ये सभी व्यक्ति किसी न किसी रूप में सत्ता, पाखंड और असमानता के विरुद्ध खड़े रहे तथा मनुष्य की मुक्ति को अपना लक्ष्य बनाया।
6. गोलेन्द्रवाद और समाज:
गोलेन्द्रवाद जातिवाद, पितृसत्ता, धार्मिक उन्माद, पूंजीवादी शोषण और राष्ट्रवादी संकीर्णता—इन सभी का प्रतिरोध करता है। यह स्त्री, दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक और श्रमिक समुदायों की गरिमा को केंद्र में रखता है।
यह दर्शन शिक्षा, राजनीति, अर्थव्यवस्था और संस्कृति—चारों क्षेत्रों में मानवीय और वैज्ञानिक पुनर्गठन की मांग करता है।
7. गोलेन्द्रवादी जीवन-दृष्टि:
गोलेन्द्रवादी जीवन का अर्थ है—
विवेकपूर्ण जीवन
करुणामय आचरण
अन्याय के विरुद्ध वैचारिक संघर्ष
लोकहित को निजी हित से ऊपर रखना
यह जीवन-पद्धति व्यक्ति को लोकसाधक, जनचेतस और विचार-योद्धा बनाती है।
8. गोलेन्द्रवाद के मेनिफेस्टो:
“गोलेन्द्रवाद के मेनिफेस्टो के आदर्श पुरुष वे हैं, जिन्होंने करुणा, विद्रोह, विवेक, समता और मुक्ति को अपने जीवन और विचार का केंद्र बनाया—
बुद्ध, कबीर, रैदास, तुकोबा, फुले, अंबेडकर, पेरियार, कार्ल मार्क्स, ओशो और महापंडित राहुल सांकृत्यायन।”
गोलेन्द्रवाद (Golendrism) के प्रवर्तक युवा कवि-लेखक एवं साहित्यिक-सांस्कृतिक चिंतक गोलेन्द्र पटेल हैं अर्थात् “गोलेन्द्रवाद—एक मानवतावादी, वैज्ञानिक और समावेशी जीवन-दर्शन—के प्रवर्तक गोलेन्द्र पटेल हैं।”
निष्कर्ष:
गोलेन्द्रवाद एक जीवंत, गतिशील और विकासशील मानवतावादी दर्शन है। यह अतीत की मानवीय परंपराओं से ऊर्जा ग्रहण करता है और भविष्य के लिए वैज्ञानिक, समतामूलक और करुणामय समाज का स्वप्न प्रस्तुत करता है।
यह न केवल सोचने का ढंग है, बल्कि जीने की कला है—जहाँ अंततः केवल मनुष्य और मानवता शेष रह जाए।....

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