Monday, October 9, 2023

धूमिल की कविताओं में जनपक्षधरता और भारतीय लोकतंत्र का स्वरूप

धूमिल की कविताओं में जनपक्षधरता और भारतीय लोकतंत्र का स्वरूप

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1). सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' का पुनर्मूल्यांकन

2). धूमिल : एक खोज

3). काव्य सिद्धांत और धूमिल का काव्य

4). जनपदीय कवि धूमिल की लोक संवेदना एवं मानवीय मूल्य

5). धूमिल के काव्य में मानव-मूल्य

6). धूमिल के गीतिकाव्य/गीत : आशा एवं संघर्ष का समवेत स्वर

7). धूमिल के साहित्य में लोकतंत्र का स्वरूप

8). धूमिल के साहित्य में उनकी सामाजिक पक्षधरता

9). धूमिल की काव्य-संवेदना

10). धूमिल की नज़र में कविता

11). धूमिल की रचना में दलित-जीवन और मानवाधिकार

12). धूमिल के साहित्य में भदेस शब्दावली

13). धूमिल की स्त्री-दृष्टि

14). विचारकों की नज़र में धूमिल

15). धूमिल की गद्य में सामाजिक परिवेश

16). धूमिल की रचनाओं में विन्यस्त समकालीन यथार्थ

17). धूमिल का रचना संसार : एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

19). धूमिल के काव्य का शैली वैज्ञानिक अध्ययन

20). धूमिल का लेखन : विस्तार और वैविध्य

21). धूमिल की रचनाओं में युगबोध

22). धूमिल की सौंदर्य-दृष्टि

23). धूमिल की कविताओं में प्रतिरोध का स्वरूप

24). धूमिल की कविता में आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक चेतना

25). धूमिल की कविता में लोकतंत्र की आलोचना

26). धूमिल : जनवादी चेतना

27). धूमिल की कविता में युगचेतना

28). धूमिल के गद्य साहित्य में सामाजिक चेतना और भाषायी सौंदर्य का समवेत

29). धूमिल का रचना संसार : युगबोध और मानवीय दृष्टि

30). धूमिल के गद्य साहित्य का पाठ विश्लेषण

31). धूमिल का गद्य साहित्य

32). धूमिल के गद्य साहित्य की वस्तु और शिल्प

33). धूमिल काव्य की भाषा एवं शिल्प

34). धूमिल का गद्य साहित्य और साठोत्तरी समय

35). सुदामा पाण्डेय 'धूमिल' और उनका युगीन परिवेश

36). धूमिल के रचना संसार में विविध स्वर

37). धूमिल : विद्रोही पक्ष, प्रसांगिकता, भाषा, भाव-चेतना

38). धूमिल की रचनाओं में ग्रामीण संस्कृति के विविध आयाम

39). लोकधर्मी व जनकवि धूमिल का रचना संसार

40). कविता के कैनवस पर धूमिल का गद्य


लेखक : गोलेन्द्र पटेल (कवि व शिक्षार्थी, हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी।)
संपर्क :
डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।
पिन कोड : 221009
मो. नं. : 8429249326
ईमेल : corojivi@gmail.com


【नोट: धूमिल से संबंधित कुछ सवाल और कुछ अन्य शीर्षक भीतर उथल-पुथल मचाये हैं. यदि आप धूमिल पर रिसर्च कर रहे हैं, तो आप अपने शोध का शीर्षक कॉमेंट बॉक्स में बता सकते हैं।】


 


Saturday, June 17, 2023

आदिकाल का नामकरण एवं प्रस्तोता

 

आदिकाल का नामकरण

प्रस्तोता

चारण काल

जॉर्ज ग्रियर्सन

प्रारंभिक काल

मिश्रबंधु

प्रारंभिक काल

गणपतिचंद्र गुप्त

बीजवपन काल

महावीरप्रसाद द्विवेदी

वीरगाथाकाल

रामचंद्र शुक्ल

सिद्ध-सामंत काल

राहुल सांकृत्यायन

वीरकाल

विश्वनाथ प्रसाद मिश्र

संधिकाल एवं चारण काल

रामकुमार वर्मा

आदिकाल

हजारीप्रसाद द्विवेदी

जयकाल

रमाशंकर शुक्ल ‘रसाल’

आधार काल

सुमन राजे

अपभ्रंश काल

धीरेंद्र वर्मा

उद्भव काल

वासुदेव सिंह

अंकुरण काल (जरमिनेशन टाइम)

गोलेन्द्र पटेल

शम्भुनाथ सिंह

उद्भवकाल, प्राचीन काल

रामखेलावन पाण्डेय

संक्रमणकाल

चंद्रधर शर्मा गुलेरी & राहुल सांकृत्यायन

पुरानी हिंदी का काल

कमल कुलश्रेष्ठ

अंधकारकाल

मोहन अवस्थी

आधारकाल

स्नातक सत्यकाम वर्मा

लोकोन्मुखी साहित्य का युग

विजयेंद्र स्नातक

वीर प्रशस्ति युग

रामप्रसाद मिश्र

संक्रांति काल

बच्चन सिंह

अपभ्रंशकाल : जाति साहित्य का उद्भव

श्यामसुंदर दास

वीरकाल (अपभ्रंश का)

 




Thursday, February 9, 2023

प्रेरणा-अंशु, 36-वर्ष, अंक-10 , फरवरी-2023 : पाठकीय टिप्पणी


प्रिय संपादक महोदय,

दिनेशपुर, उत्तराखंड, भारत।


नमस्कार!

जैसा कि हम सब जानते हैं कि लघु पत्रिकाएँ हमें जगाती हैं, उकसाती हैं और रचनात्मक दुनिया को भीतर जोड़े रखती हैं। वे हमारी सृजनात्मकता को सींचती हैं। एक अच्छी साहित्यिक पत्रिका हमारी मार्गदर्शिका होती है।


36 वर्षों से साहित्य की दुनिया में "प्रेरणा-अंशु" का आगाज जितना शानदार रहा उतनी ही शानदार इसकी प्रस्तुतियाँ भी हैं। 'फरवरी-2023' अंक अभी हाल ही में प्राप्त हुआ है। आवरण देखकर मन गदगद है और आत्मा आह्लादित। बहुत ही सुंदर व सुव्यवस्थित अंक है। सराहनीय आवरण पृष्ठ है। पूरी पत्रिका में साहित्य और कला का सुंदर समन्वय देखते ही बनता है। इसकी संपादकीय टिप्पणी उत्तम और उच्च कोटि की है। इसके लिए कार्यकारी संपादक व प्रिय साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक श्री पलाश विश्वास जी, संयुक्त संपादक श्री रूपेश कुमार सिंह जी, तकनीकी सहयोगकर्त्ता श्री अरुण मिश्र जी एवं संपादक मंडल के सभी सदस्य बधाई के पात्र हैं। इस अंक का अनुक्रम अद्भुत है, जो एक पाठक को एक ही बैठक में पढ़ने के लिए मजबूर कर दिया। खैर, मैं तो इसे पीडीएफ फ़ाइल से तीन बार में पढ़ा। पर मेरे दोस्तों ने हार्डकॉपी में पत्रिका को एक ही बार में पढ़ डाला है। पत्रिका सदा की भाँति तथ्यपूर्ण, ज्ञानवर्धक एवं शोधपरक जानकारी से सराबोर है। एक उम्मीद भरे हुए पाठक को इस सोपान से बढ़कर और क्या चाहिए।


मैं 'प्रेरणा-अंशु' का एक बहुत पुराना नियमित पाठक हूँ। मुझे यह अपने प्रत्येक मोर्चे पर एक बेहद समर्पित व सक्रिय पत्रिका लगती है। क्योंकि इसमें मुझे लगातार उत्कृष्ट एवं विविधता भरी रचनाएँ अपने नये अस्वाद व स्वाद के साथ पढ़ने को मिल रही हैं। प्रिय पथप्रदर्शक पलाश जी के संपादन में यह नित्य नवीन दिशा की ओर आगे बढ़ रही है। कहते हैं कि जब काबिल लोग ऐसी जिम्मेदारी लेते हैं, तो किस तरह से कला, विचारों, ज्ञान, संतुलन, विविधता को ऊँचाई प्रदान करते हैं, इसी का एक उदाहरण है प्रिय पलाश  जी का यह प्रयास। उनके भीतर छिपे कुशल संपादक की प्रतिभा अंक में यत्र, तत्र व सर्वत्र देखने को मिलती है। आपकी पत्रिका सम्पूर्ण हिंदी साहित्य विधा को समेटे हुए होती है, यह पाठकों के लिए सुखद है।


इस अंक में मेरी (गोलेन्द्र पटेल) रचनाओं को जगह देने के लिए आपका हार्दिक आभार और अनंत शुभकामनायें। पत्रिका के अन्य बिन्दुओं पर बात करने से पहले एक सुझाव है कि रचनाओं के शीर्षक और उपशीर्षक (टैग लाइन) पर विशेष ध्यान दें तो बेहतर रहेगा और आप आलोचनापरक लेखों पर भी कुछ ध्यान दें। जैसे इस अंक में मेरी ही रचनाओं के शीर्षक गायब हैं। इस अंक में मुझे कई नये नाम मिले हैं, जिनकी रचनाएँ पढ़ने के बाद उनसे बातें करने का मन है लेकिन इसमें उनके संपर्क सूत्र नहीं दिये हैं। कम से कम रचनाकारों का मोबाइल नंबर रहता तो अच्छा होता, यदि आप एक-दो पंक्तियों में रचनाकारों का संक्षिप्त परिचय देंगे, तो नये पाठकों को पत्रिका और प्रभावित करेगी।  


यह अंक साहित्य और सामाजिक सरोकारों से लवरेज है, जो एक बहुआयामी पत्रिका की पहचान दिलाती है। स्तरीय रचनाओं का होना आपकी संपादकीय परिपक्वता को दर्शाती है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि पत्रिका का भविष्य संपादक की दूरदर्शिता पर निर्भर करता है। आपकी संपादकीय टिप्पणी सच में ही आत्मीयता लिए हुए होती है। ख़ास कर "युवाओं के लिए अग्निपथ" या "अपनी बात" जैसा स्तंभ। आपका अथक प्रयास सराहनीय है। आपकी पत्रिका इसी तरह आधुनिक चेतना एवं ज्ञान-विज्ञान तथा साहित्य व संस्कृति की उन्नायिका रहे, यह आपकी जिम्मेदारी भी है।


निःसंदेह यह अंक पठनीय और संग्रहणीय है। पलाश जी का 'हिमालय को जोशीमठ के आईने में देंखें' लेख एवं अनिता रश्मि जी की कहानी 'सही निर्णय' आदि रचनाएँ आकर्षित करती हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि 'प्रेरणा-अंशु' पत्रिका इसी तरह निकलती रहेगी और हमें पढ़ने को मिलती रहेगी। साहित्य सेवा की यह यात्रा अनवरत जारी रहे यही ईश्वर से प्रार्थना है मेरी। पुनः आदरणीय पलाश जी एवं रूपेश जी को हार्दिक बधाई और अनंत शुभकामनायें!

-गोलेन्द्र पटेल (कवि व लेखक : साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चिंतक, छात्र, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी)

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com



Sunday, January 1, 2023

हिंदी साहित्य का ऐतिहासिक सफरनामा वर्ष 2022

 

(चर्चित युवा कवि, लेखक व शिक्षक विनय विश्वा)

हिंदी साहित्य का ऐतिहासिक सफरनामा वर्ष 2022


हिंदी साहित्य जगत में वर्ष 2022 कई मायनों में यादगार रहेगा।

जैसे साहित्य अकादमी पुरस्कार किसी काव्य संग्रह को मिला ,तो विश्व साहित्य में एनी एर्ना के संस्मरणात्मक , तो गीतांजलि श्री के उपन्यास रेत समाधि को बुकर पुरस्कार, और भी कई मायने में यादगार रहा पर अब तक का ऐतिहासिक सफर ये कहता है की युवा कवि गोलेंद्र पटेल की कविता 'तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' हिंदी साहित्य की अब तक की सबसे लंबी कविता है जो तीन खंड में है जो लगभग एक सौ बयासी पृष्ठ की है जो हिंदी साहित्य जगत में एक अमूल्य निधि है जिसे पढ़ा जाना चाहिए।

       और मजे की बात है की इस लंबी कविता की सबसे पहले आलोचना एक युवा कवि जो शिक्षक भी है और शोधार्थी भी विनय विश्वा के द्वारा की गई है जो कविता के नए आयाम खोलती हैं

             अब देखना यह ज़रूरी है की क्या हिंदी के सचमुच जो सेवा करने वाले हैं क्या इस महत्वपूर्ण कार्य को त्वज्जों देंगे या केवल साहित्य सेवी साहित्य सेवी का नारा भर ही लगाएंगे ,या महंत बने फिरते रहेंगे।

    आख़िर कब तक नई पीढ़ी को इंतज़ार करनी पड़ेगी जब यह जगत छोड़ चुके होंगे जैसे मुक्तिबोध,धूमिल आदि महत्वपूर्ण कवि।

    2023 में इस प्रश्न के उत्तर का इंतज़ार रहेगा🙏

         धन्यवाद!

                    © विनय विश्वा

            01/01/2023

Friday, December 23, 2022

"जोंक' कविता : कायफल किसान के सर्वस्व का प्रतीक है" : आर. डी. आनंद

 कायफल किसान के सर्वस्व का प्रतीक है : आर. डी. आनंद



जोंक

रोपनी जब करते हैं कर्षित किसान ;
तब रक्त चूसती हैं जोंक!
चूहे फसल नहीं चरते
फसल चरते हैं
साँड और नीलगाय.....
चूहे तो बस संग्रह करते हैं
गहरे गोदामीय बिल में!
टिड्डे पत्तियों के साथ
पुरुषार्थ को चाट जाते हैं
आपस में युद्ध कर
काले कौए मक्का बाजरा बांट खाते हैं!
प्यासी धूप
पसीना पीती है खेत में
जोंक की भाँति!
अंत में अक्सर ही
कर्ज के कच्चे खट्टे कायफल दिख जाते हैं
सिवान के हरे पेड़ पर लटके हुए!
इसे ही कभी कभी ढोता है एक किसान
सड़क से संसद तक की अपनी उड़ान में!

-गोलेन्द्र पटेल

टिप्पणी :-

कविता में कर्षित किसान शब्द का प्रयोग हुआ है जिसका अर्थ है ''उत्पीड़ित किसान''। वैसे इस कविता को समझने के लिए हमें "किसान'' और "मजदूर" की परिभाषा को संज्ञान में ले लेना चाहिए। किसान उन्हें कहा जाता है, जो खेती का काम करते हैं। इन्हें कृषक और खेतिहर के नाम से भी जाना जाता है। ये बाकी सभी लोगो के लिए खाद्य सामग्री का उत्पादन करते है। इसमें फसलों को उगाना, बागों में पौधे लगाना, पशुओं की देखभाल कर उन्हें बढ़ाना भी शामिल है। कोई भी किसान या तो खेत का मालिक हो सकता है या उस कृषि भूमि के मालिक द्वारा काम पर रखा गया मजदूर हो सकता है। अच्छी अर्थव्यवस्था वाले जगहों में किसान ही खेत का मालिक होता है और उसमें काम करने वाले उसके कर्मचारी या मजदूर होते हैं। हालांकि, इससे पहले तक केवल वही किसान होता था, जो खेत में फसल उगाता था।


कोई भी ऐसा व्यक्ति जो अपनी श्रम शक्ति को बेचकर रोजगार प्राप्त करके अपना जीवन यापन करता है तो वह एक मजदूर है। वैसे हमारे देश में औद्योगिक विवाद अधिनियम (1947) की परिभाषा के अनुसार यह फैसला किया जाता है कि कौन मजदूर है। औद्योगिक विवाद अधिनियम के दफा 2 (एस) में मजदूर की परिभाषा इस प्रकार दी गयी है: “मजदूर (प्रशिक्षु समेत) कोई भी ऐसा व्यक्ति है जो मजदूरी या वेतन के बदले, किसी उद्योग में शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, कार्यकारी, क्लर्क या सुपरवाइज़र का काम करता हो, चाहे काम की शर्तें स्पष्ट या अन्तर्निहित हों, वह मजदूर है।"


इस बात से स्पष्ट होता है कि एक मजदूर से फसल रोपने का भी काम लिया जा सकता है लेकिन मजदूर का काम सिर्फ फसल रोपना नहीं होता है जबकि किसान का कार्य खेती में सभी कार्यों को करना होता है। किसान मजबूरी में मजदूरी भी करता है लेकिन किसान का कार्य मजदूरी करना नहीं है बल्कि उसके मुख्य कार्यों में से फसल का रोपना भी आता है। यहाँ कविता में कवि प्रताड़ित किसान की बात कर रहा है। प्रताड़ित किसान यदि अन्य मजदूर के खेत में रोपाई नहीं करने जाएगा तो अपने खेत की रोपाई तो करेगा ही। यहाँ किसान और मजदूर के बुनियादी कार्य स्वरूप को लेकर फसल रोपाई पर आलोचना निर्थक होगा।


धूप-वर्षा में गाँठ भर पानी में किसान निहुरे-निहुरे धान की रोपाई करता है। खेत में जोंक उसका खून सूचती है। यहाँ जोंक वास्तविक परेशानी के अर्थ में भी है और शासन, प्रशासन और धन्नासेठों के पूँजीवादी रवैये के रूप में भी है जो किसान का सिर्फ फायदा उठाते हैं और मज़ाक बनाते हैं। टिड्डे भी उसकी परेशानी के सबब भी हैं और बाह्य विसंगतियों के प्रतुरूप भी हैं। काले कौए भी लुटेरों के प्रतीक हैं। इस तरह कवि की अनुभूति की प्रसंशा करना न सिर्फ आलोचक की जिम्मेदारी है बल्कि मजबूरी है।


अंत में, कवि अपनी फसल को "कायफल" की संज्ञा देता है। "कायफल" का पेड़ उत्तर प्रदेश, पंजाब, आसाम और हिमालय के गर्म जगहों में बहुत पाए जाते हैं। इसके पेड़ 10 से 15 फुट ऊंचे होते हैं। कायफल के पेड़ की छाल मटमैली भूरी होती है, पत्ते नुकीले व लम्बे होते हैं और इसके फल गोल होते हैं। कायफल की 2 जातियां होती है- काली और सफेद। कायफल के फूल छोटे, लाल, खुशबूदार और गुच्छों में होते हैं और फल एक इंच से भी छोटे, गोल, पकने पर खून के रंग या पीलापन लिए बादामी रंग के होते हैं। फल का स्वाद मीठा व खट्टा होता है। फलों के ऊपर सफेद रंग का आवरण चढ़ा रहता है जो भूरे व काले धब्बे से युक्त होते हैं। फलों में झुर्रिदार बीज होते हैं जो फालसे की तरह स्वादिष्ट होते हैं। इसकी छाल से रस्सियाँ बनाई जाती हैं। औषधियों के लिए लाल कायफल अधिक उपयोगी होता है। पेड़ की छाल को भी कायफल कहते है और यह भी औषधियों के रूप में प्रयोग की जाती है।


कायफल का रस स्वाद में कडुवा, तीखा व कषैला होता है। इसकी प्रकृति गर्म होती है। इसका फल पकने के बाद कडुवा हो जाता है। कायफल वात व कफ से उत्पन्न रोगों को शांत करता है और वात के कारण उत्पन्न दर्द को खत्म करता है। इसका उपयोग सिर दर्द, सर्दी-जुकाम, मूर्च्छा (बेहोशी) एवं मिर्गी आदि के लिए किया जाता है। यह सांस रोग व खांसी में फायदेमंद है। यह नपुंसकता को मिटाता है। इसके फूलों से निकाले गए तेल भी गर्म व रूखा होता है। इसके तेल से लकवा की बीमारी में मालिश करने से फायदा होता है। नपुंसकता में इस तेल को लिंग पर मलने से नपुंसकता दूर होती है। यह सिर दर्द को दूर करता है और नाक में इसके तेल को टपकाने से नाक से खून आना बंद होता है।


कायफल का रासायनिक तत्त्वों का विश्लेषण करने पर पता चला है कि कायफल की छाल में 32 प्रतिशत टैनिन और मिरिसाइट्रिन नामक ग्लाइकोसाइड पाया जाता है। कायफल उत्तेजक, संकोचक, कृमिनाशक, छाती में जमे हुए कफ को निकालने वाला, हृदय रोग में गुणकारी और अतिसार दूर करने वाला होता है।


किसान की फसल, जो हरे पेड़ पर लटका हुआ है, एक प्रतीक है। वह फसल कच्चे और खट्टे कायफल की तरह है। वह फसल ही किसान का सब कुछ है लेकिन वह सिवान के हरे पेड़ पर लटका है अर्थात उस पर भी उसका अधिकार नहीं है बल्कि वह किसी और के अधीन है। उस फसल को भी वह धन्नासेठों के लिए शहर में भेजने को मजबूर है।


शुभकामनाएँ!

आर डी आनंद

14.07.2020

कवि : गोलेन्द्र पटेल 

संपर्क :

डाक पता - ग्राम-खजूरगाँव, पोस्ट-साहुपुरी, जिला-चंदौली, उत्तर प्रदेश, भारत।

पिन कोड : 221009

व्हाट्सएप नं. : 8429249326

ईमेल : corojivi@gmail.com

Tuesday, December 13, 2022

"परिकथा" पत्रिका || साहित्यिक रणनीति : वाचस्पति, वाराणसी.

 "परिकथा"वाले अलग से युवा लेखन अंक निकालते रहे हैं।अब उनकी पॉलिसी का पता नहीं।लेखकगण विषमता अन्याय शोषण आदि का विरोध काग़ज़ातों पर करते हैं ताकि सनद रहे और वक़्त पर काम आये।अच्छे वेतन की बहुत अच्छी नौकरी पा जाने पर चाय की दुकानों पर बैठने से प्रतिरोध की प्रेरणा मिलती है! किसी और जगह के जुटान से भी क्रांतिकारी विचार जन्म ले सकते हैं।

 छवि निर्माण भर का अध्ययन-अधपका पका लेखन-प्रकाशन पत्रिकाओं पुस्तकों के रूप में शुरू में बरसों तक निश्शुल्क सेवा-छवि पुख़्ता होने पर धीमी गति से नगदीकरण-विश्वविद्यालयों सरकारी कमेटियों लिटफेस्ट आदि में न्यौता पाने का अटूट सिलसिला-संपर्क सूत्र सशक्त हों तो साहित्य के छोटे और मोटे इनाम भी मिलते हैं-पद क़द बड़ा हो जाने पर देश विदेश में साहित्यिक पर्यटन के अनेक सुअवसर सुलभ हो सकते हैं!

    अभावों दु:खों की कलात्मक प्रस्तुति करनेवाले  युवा रचनाकारों का भारत जैसे देश में बढ़िया स्कोप है!विश्वगुरु बन जाने पर साहित्यिक रणनीति नये सिरे से बनानी पड़ेगी। साहित्यकार को इतने पैसे तो कमाने चाहिए कि उसकी पुस्तकें  रोशनी पा सकें!समझदार को अनुभवी गुरुजन और भी उन्नतिशील होने के टिप्स पात्रतानुसार दे सकते हैं!-वाचस्पति, वाराणसी.

Sunday, October 23, 2022

कविवर गोलेन्द्र पटेल || उपनाम/उपाधि : 'गोलेंद्र ज्ञान', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'वेदना के वैभव', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'ऋषि कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'रूपकराज', 'कोरोजयी कवि' एवं 'दिव्यांगसेवी' आदि

 

हिंदी जगत में गोलेन्द्र पटेल जी सबसे कम उम्र में अपनी पहचान बनाने वाले युवा रचनाकार हैं। इनको  'गोलेंद्र ज्ञान', 'युवा किसान कवि', 'हिंदी कविता का गोल्डेनबॉय', 'काशी में हिंदी का हीरा', 'वेदना के वैभव', 'आँसू के आशुकवि', 'आर्द्रता की आँच के कवि', 'अग्निधर्मा कवि', 'ऋषि कवि', 'निराशा में निराकरण के कवि', 'दूसरे धूमिल', 'काव्यानुप्रासाधिराज', 'कोरोजयी कवि' एवं 'दिव्यांगसेवी' आदि उपनामों एवं उपाधियों से जाना जाता है। इनका जन्म 5 अगस्त 1999 ई. को उत्तर प्रदेश के चंदौली के खजूरगाँव में हुआ था। इनकी माता का नाम उत्तम देवी है और इनके पिता का नाम नन्दलाल है। इनके पिता मजदूर हैं। गोलेन्द्र पटेल असाधारण प्रतिभाशाली कवि हैं, समय के सजग सर्जक हैं। ये बहुमुखी प्रतिभा के धनी हैं। ये अपने काव्य के बाह्य और आन्तरिक दोनों पक्षों को सँवारने में सदैव सचेष्ट हैं। अर्थात् इनके भावपक्ष और कलापक्ष दोनों ही अतीव पुष्ट हैं। भाव और कला, अनुभूति और अभिव्यक्ति, वस्तु और शिल्प सभी क्षत्रों में गोलेन्द्र जी ने युगांतरकारी परिवर्तन व प्रयोग किए हैं। ये युगद्रष्टा व युगस्रष्टा दोनों ही हैं। इनके काव्य में एक ऐसा नैसर्गिक आकर्षण एवं चमत्कार है कि सहृदय पाठकगण उसमें रसमग्न होकर नयी राह पर आगे बढ़ते हैं। इनकी कविता मन-मस्तिष्क और हृदय को झकझोर देती है। ये काव्य-लेखन को नवीन दिशा और दृष्टि प्रदान करने का भगीरथ प्रयास कर रहे हैं। अपने कवि व्यक्तित्व, साहित्यिक सहजता एवं कृतित्व के आधार पर, गंभीर आलोचना, विचार प्रधान निबंधों और उत्कृष्ट कहानियों की रचना कर गोलेन्द्र जी ने निश्चय ही हिंदी साहित्य में गौरवपूर्ण स्थान पा लिया है। हिंदी साहित्य जगत् में ये एक श्रेष्ठ कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं। हिंदी लंबी कविता के क्षेत्र में गोलेन्द्र पटेल का विशिष्ट स्थान है। इनकी लंबी कविता ‘तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव’। अब तक की हिंदी की सबसे लंबी कविता है। यह कविता दो खण्डों में विभाजित है लेकिन अंतर्दृष्टि अर्थात् आलोचकीय आँखों से पढ़ने पर अविभाजित है। यह कविता 2020 में लिखी (रची) गयी थी। गोलेन्द्र पटेल काशी हिंदू विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। इस कविता के बारे में ये अक्सर कहते हैं कि "तुम्हारी संतानें सुखी रहें सदैव' एक लंबी कविता है। सभ्यता और संस्कृति इसकी देह और आत्मा हैं, मित्रता और मुहब्बत इसकी बुद्धि और प्रज्ञा हैं और अनुभव और अभ्यास इसकी परम अभिव्यक्ति की प्रज्ञात्मा हैं!" इनके काव्य-व्यंग्यों में समाज एवं व्यक्ति की कमजोरियों पर तीखा प्रहार मिलता है। इनके काव्य हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि हैं। निस्संदेह गोलेन्द्र जी हिंदी-काव्य-गगन के अप्रतिम तेजोमय मार्तण्ड हैं।


-रश्मि त्रिपाठी



गोलेन्द्रवाद और आदिवासी स्त्री विमर्श : एक तुलनात्मक अध्ययन

गोलेन्द्रवाद और आदिवासी स्त्री विमर्श : एक तुलनात्मक अध्ययन गोलेन्द्रवाद और आदिवासी स्त्री विमर्श दोनों ही भारतीय समाज की हाशिए पर स्थित चेत...